अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-83)
अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। अमेरिकी स्वातंत्र्य संग्राम के साथ ही यूरोप में क्रांतियों की एक श्रृंखला आरंभ हो गई। इस क्रांति ने पहली बार विश्व के समक्ष जनतांत्रिक शासन-प्रणाली का उदाहरण रखा। साथ ही, इसने विश्व को प्रथम लिखित संविधान भी दिया।
अमेरिका में उपनिवेश की स्थापना क्रिस्टोफर कोलम्बस (1451-1506) के अभियानों तथा फ्लोरेंस के नाविक अमेरिगो वेस्पुस्सी (1451-1512) के प्रयासों से अमेरिका अथवा नई दुनिया (New World) का पता लगा। अमेरिका का पता लगते ही यूरोप की प्रमुख शक्तियों – स्पेन, पुर्तगाल, इंगलैंड और फ्रांस में अमेरिका में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित करने की होड़ लग गई। इसी क्रम में इंगलैंड ने उत्तरी अमेरिका में अपने 13 उपनिवेश स्थापित किए। ये तेरह उपनिवेश थे— न्यू हैंपशायर, मेसाचुसेट्स, रोड आइलैंड, क्नेक्टिकट, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, पेनसिलवेनिया, डेलावेयर, मेरीलैंड, वर्जीनिया, उत्तरी कैरोलीना, दक्षिणी कैरोलीना और जॉर्जिया । इनका प्रशासन इंगलैंड में प्रचलित प्रशासनिक व्यवस्था के अनुरूप होता था। प्रशासन पर इंगलैंड का प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों नियंत्रण रहता था। उपनिवेशवासी इंगलैंड द्वारा लागू किए गए कानूनों से क्षुब्ध थे। यह आक्रोश अन्य आर्थिक-सामाजिक कारणों से बढ़ता ही गया। अंत में उपनिवेशवासी इंगलैंड के विरुद्ध विद्रोह पर उतारू हो गए। इस विद्रोह ने स्वतंत्रता संग्राम का रूप ले लिया जिससे अंततः अमेरिकी उपनिवेश इंगलैंड के चंगुल से मुक्त हो सके।
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के कारण
अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक- धार्मिक, भौगोलिक, बौद्धिक और आर्थिक कारणों का परिणाम था।
राजनीतिक कारण
(i) उपनिवेशों की प्रशासनिक व्यवस्था – उपनिवेशों का प्रशासन इंगलैंड में प्रचलित शासन व्यवस्था के अनुरूप था। उपनिवेशवासियों को प्रशासनिक स्वायत्तता नहीं थी। इंगलैंड में प्रचलित कानून उपनिवेशों में भी लागू थे। न्याय-व्यवस्था सामान्य कानून एवं जूरी-व्यवस्था पर आधृत थी। अधिकांश महत्त्वपूर्ण पदों पर अँगरेजों को ही नियुक्त किया जाता था। प्रत्येक उपनिवेश के प्रशासन का प्रधान इंगलैंड के राजा द्वारा परंतु नियुक्त गवर्नर होता था। उसे अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे, वह उपनिवेशवासियों के प्रति उत्तरदायी नहीं था। यद्यपि व्यवस्थापिका सभा का गठन उपनिवेशवासियों द्वारा निर्वाचित सदस्यों से होता था, परंतु गवर्नर और व्यवस्थापिका सभा में सदैव संघर्ष होता रहता था। उपनिवेशों में रहनेवाले अधिकांश अँगरेज थे जो इंगलैंड में प्रचलित संसदीय व्यवस्था और प्रजातांत्रिक व्यवस्था की आकांक्षा रखते थे। इंगलैंड के शासक ऐसा नहीं करना चाहते थे। अतः, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वायत्तता का प्रश्न संघर्ष का कारण बन गया।
(ii) जॉर्ज तृतीय का निरंकुश शासन- तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज तृतीय (1760–1820) के निरंकुश शासन ने भी विद्रोह को बढ़ावा दिया। मंत्रिमंडल की अनदेखी कर वह अपना व्यक्तिगत शासन चलाता था। उसने उपनिवेशों के प्रति अनुदार नीति अपनाई। अनेक कानूनों द्वारा जॉर्ज तृतीय ने उपनिवेशों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। सम्राट की इन नीतियों की तीखी प्रतिक्रिया उपनिवेशों में हुई। इससे आक्रोश बढ़ा और विद्रोह की भावना बलवती हुई।
(iii) सप्तवर्षीय युद्ध का प्रभाव- यूरोप में होनेवाले सप्तवर्षीय युद्ध (1756–63) से अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा मिली। यह युद्ध फ्रांस और इंगलैंड के बीच हुआ। इस युद्ध के पूर्व अमेरिकी उपनिवेश इंगलैंड से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे, क्योंकि कनाडा में वे फ्रांसीसियों का अकेले मुकाबला नहीं कर सकते थे। सप्तवर्षीय युद्ध में फ्रांस बुरी तरह पराजित होकर अमेरिका से हट गया। अतः, अब इंगलैंड ही एकमात्र शक्ति था जिसका सामना उपनिवेशवासियों को करना था। साथ ही, सप्तवर्षीय युद्ध के दौरान अमेरिकी उपनिवेशों में युद्ध के सामान तैयार होने से औद्योगिकीकरण बढ़ा तथा उपनिवेशवालों के पास पर्याप्त मात्रा में अस्त्र-शस्त्र उपलब्ध हो गए। फलतः, इंगलैंड के साथ संघर्ष करने को तैयार हो गए। इसीलिए, कहा जाता है कि सप्तवर्षीय युद्ध में इंगलैंड की विजय से ही अमेरिका का इतिहास आरंभ होता है।
सामाजिक-धार्मिक कारण
(i) सामाजिक संरचना में अंतर- इंगलैंड और उपनिवेशों की सामाजिक संरचना में मूलभूत अंतर था। इंगलैंड में सामंतवादी व्यवस्था एवं कुलीनों का प्रभाव था। इसके विपरीत, अमेरिका में समानता की भावना एवं जनतांत्रिक मूल्यों को अधिक महत्त्व दिया गया।
(ii) मध्यम वर्ग का उदय – क्रांति के आरंभ होने के पूर्व ही अमेरिका में एक सशक्त मध्यम वर्ग का उदय हो चुका था। इसके अंतर्गत शिक्षित एवं धनी व्यक्ति थे। वे स्वतंत्र और प्रगतिशील विचारों के थे। उनमें सैनिक क्षमता एवं रणकुशलता भी थी। वे उपनिवेशों के शोषण और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किए जाने से उद्विग्न होकर स्वतंत्रता एवं समानता की भावना का प्रचार कर रहे थे।
(iii) स्वतंत्रता एवं आत्मविश्वास की भावना – उपनिवेशवासी स्वतंत्र प्रवृत्ति के थे। उनमें अधिकांश इंगलैंड से आकर बसे थे। उनलोगों ने इंगलैंड में नागरिक अधिकारों के लिए निरंकुश राजतंत्र को नियंत्रित करनेवाले संघर्ष को देखा था। उन्हें यह बात अटपटी लगती थी कि इंगलैंडवालों को जो नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रता प्राप्त थी उनसे उपनिवेशवासियों को वंचित रखा गया था। इससे उनमें असंतोष बढ़ा।
(iv) धार्मिक कारण- इंगलैंड में ऐंग्लिकन संप्रदाय एवं चर्च का व्यापक प्रभाव था। इसके विपरीत, उपनिवेशवासी प्यूरिटन मत के पोषक थे और ऐंग्लिकनों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। धार्मिक अत्याचारों से क्षुब्ध होकर प्यूरिटनों और प्रोटेस्टेंटों ने इंगलैंड से भागकर अमेरिका में शरण ली थी। इससे उनमें इंगलैंड के विरुद्ध विद्रोह की भावना बढ़ी। अतः, वे इंगलैंड से स्वतंत्र होने को व्यग्र हो गए।
भौगोलिक कारण
अमेरिकी स्वातंत्र्य संग्राम को भौगोलिक दूरी ने भी प्रभावित किया। अमेरिका और इंगलैंड हजारों मील की दूरी पर अटलांटिक महासागर के दो किनारों पर अवस्थित थे। आवागमन के पर्याप्त साधनों के अभाव में इंगलैंड का उपनिवेशों पर प्रभावी और प्रत्यक्ष नियंत्रण बनाए रखना दुष्कर कार्य था। उपनिवेशवासी इंगलैंड की इस समस्या से परिचित थे। अतः, वे इंगलैंड के साथ युद्ध करने को तैयार हो गए।
बौद्धिक जागरण
17वीं-18वीं शताब्दियों के बौद्धिक जागरण का प्रभाव अमेरिकी उपनिवेशवासियों पर भी पड़ा। अमेरिका का शिक्षित वर्ग वाल्तेयर, लॉक, रूसो, मांटेस्क्यू के राजनीतिक दर्शन से गहरे रूप से प्रभावित हुआ। इनसे प्रेरणा लेकर टॉमस पेन जैसे अमेरिकी लेखक ने भी उपनिवेशों में नवजागरण लाने का प्रयास किया। टॉमस पेन ने कॉमनसेंस फैम्फलेट में लेख लिखकर स्वतंत्रता की आवश्यकता पर बल दिया। ‘दि राइट्स ऑफ मैन’ (The Rights of Man) नामक पुस्तक में उसने मानव अधिकारों का उल्लेख किया। वह मानव अधिकारों की सुरक्षा का समर्थक था। उसने राजतंत्र की भी कटु आलोचना की। टॉमस जेफर्सन ने भी विद्रोह की भावना को बढ़ावा दिया। इससे भी स्वतंत्रता संग्राम की चाह बढ़ी।
प्रतिगामी वाणिज्यिक (आर्थिक) कारण
उपनिवेशों की दयनीय आर्थिक स्थिति- सप्तवर्षीय युद्ध की समाप्ति के पश्चात अमेरिका की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई। उसपर कर्ज का बोझ बढ़ गया। मुद्रा का अवमूल्यन होने से अनाज की कीमत में कमी आई जिसका बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ा। कल-कारखाने बंद हो गए। इस स्थिति से निकलने के लिए नई आर्थिक नीति की आवश्यकता थी, परंतु औपनिवेशिक सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इससे असंतोष एवं विद्रोह की भावना बढ़ी।
उपनिवेशों पर आर्थिक प्रतिबंध
औपनिवेशिक आर्थिक नीति उपनिवेशों के आर्थिक दोहन पर आधृत थी। अतः, औपनिवेशिक सरकार ने अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए अनेक कानून बना रखे थे। दूसरी ओर उपनिवेशवासी उन्मुक्त व्यापार की धारणा से प्रभावित थे। इसकी उपेक्षा कर इंगलैंड ने अनेक कानून बना रखे थे। इससे उपनिवेशवासी क्षुब्ध थे। ऐसे कानूनों में निम्नलिखित प्रमुख थे। (i) नेविगेशन ऐक्ट एवं अन्य ट्रेड ऐक्ट- इस ऐक्ट के कारण अमेरिकी उपनिवेश अपनी अर्थव्यवस्था का विकास नहीं कर सकते थे। गैर-ब्रिटिश जहाज माल लेकर अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकते थे। उपनिवेशवासी अपना सामान अधिक मूल्य पर भी इंगलैंड के अतिरिक्त अन्य किसी देश को नहीं बेच सकते थे। इससे अमेरिकी व्यापार का विकास अवरुद्ध हो गया।
(ii) आयात-निर्यात कानून-अमेरिकी उपनिवेशों के आयात- निर्यात पर इंगलैंड ने अनेक प्रतिबंध लगा रखे थे। उपनिवेश- वासी कपास, चीनी एवं तंबाकू इंगलैंड के अतिरिक्त अन्य किसी देश को नहीं भेज सकते थे। उपनिवेशों में बाहर से आनेवाले सामान पर भारी आयात कर लगाया जाता था।
(iii) स्टांप ऐक्ट-इंगलैंड का प्रधानमंत्री ग्रेनविले उपनिवेशों में प्रचलित चोरबाजारी को रोकना चाहता था। इसके लिए उसने अमेरिका में स्थायी सेना रखने की योजना बनाई। सेना का खर्च पूरा करने के लिए उसने 1765 में स्टांप ऐक्ट पारित किया। इसके अनुसार, सभी अदालती कागजों, बंधक की दस्तावेजों, समाचारपत्रों तथा इश्तहारों पर 20 शिलिंग का डाक टिकट (सरकारी टिकट अथवा स्टांप) लगाना अनिवार्य बना दिया गया। इससे वकील, व्यापारी, प्रकाशक सभी पर आर्थिक बोझ बढ़ गया। इस कानून का विरोध किया गया। सैमुअल एडम्स ने नारा दिया — प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं (No taxation without representation)। प्रतिरोध को देखते हुए इंगलैंड की सरकार ने स्टांप ऐक्ट को वापस तो ले लिया, परंतु उपनिवेशों पर कर लगाने के अपने अधिकार को वैध ठहराया।
(iv) इंपोर्ट ड्यूटीज ऐक्ट- 1767 में अँगरेजी सरकार ने अमेरिका में आयातित होनेवाले उपभोक्ता सामानों— शीशा, चाय, रंग और कागज आदि — पर आयात चुंगी लगा दी। उपनिवेशवासियों ने इसका कड़ा विरोध किया। सरकार का विरोध करने के लिए अनेक संगठन बनाए गए। इनमें प्रमुख थे— स्वाधीनता के पुत्र और स्वाधीनता की पुत्रियाँ इस विरोध के कारण सरकार ने चाय के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं पर से चुंगी हटा ली ।
(v) लॉर्ड नॉर्थ के दंडात्मक कानून – उपनिवेशों के लगातार विरोध से क्रुद्ध होकर सरकार ने उपनिवेशवासियों को दंडित करने का निर्णय लिया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड नॉर्थ ने 1774 में चार असहनीय कानून (Four Intolerable Acts) बनाए। इनमें सबसे
महत्त्वपूर्ण था बोस्टन बंदरगाह को बंद करना। इसी प्रकार, क्यूबेक ऐक्ट द्वारा भी उपनिवेशों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए गए। उपनिवेशवासियों ने इनका कड़ा विरोध किया एवं
संघर्ष के लिए तैयार हो गए।
तात्कालिक कारण
बोस्टन की चाय-पार्टी — अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण था बोस्टन की चाय पार्टी । चाय कानून द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत से सीधा अमेरिका चाय भेजने का एकाधिकार दिया गया। इस कानून का उपनिवेशवालों ने कड़ा विरोध किया। 1773 में कंपनी की चाय से लदे जहाज अमेरिका के बोस्टन बंदरगाह पर पहुँचे। उपनिवेशवासी सरकार द्वारा चाय पर कर लगाए जाने से क्रुद्ध थे। जहाजों के बंदरगाह में पहुँचने पर बोस्टन के नागरिकों ने आदिवासियों (रेड इंडियन) के वेष में चाय की पेटियाँ समुद्र में फेंक दीं। यह घटना बोस्टन चाय-पार्टी के नाम से विख्यात हुई। प्रतिक्रिया में सरकार ने बोस्टन बंदरगाह को व्यापार के लिए बंद कर दिया और दमनकारी कानून लागू कर दिए। इस घटना ने स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया।
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरण और स्वरूप
औपनिवेशिक सरकार की नीतियों से क्षुब्ध होकर उपनिवेशवासी संघर्ष के लिए तैयार हो गए। इसका आरंभ फिलाडेलफिया के प्रथम सम्मेलन से हुआ।
फिलाडेलफिया का प्रथम सम्मेलन – 5 सितंबर 1774 को फिलाडेलफिया में अमेरिकी उपनिवेशों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई। प्रतिनिधियों ने सरकार से माँग की कि उपनिवेशों पर लगाए गए व्यापारिक प्रतिबंध समाप्त कर दिए जाएँ एवं उपनिवेशवासियों की सहमति के बिना उनपर कोई कर नही लगाया जाए। सरकार ने यह माँग ठुकरा दी। इतना ही नहीं, उसने उपनिवेशवासियों की माँगों को विद्रोह ठहरा दिया। विद्रोह को दबाने के लिए सरकार ने सेना भेजने का निर्णय लिया। उपनिवेशवासी भी संघर्ष के लिए तैयार हो गए। 19 अप्रैल 1775. को अमेरिकी स्वातंत्र्य संग्राम का प्रथम युद्ध लेक्सिंगटन में हुआ। उपनिवेशवासियों ने अँगरेजी सेना का डटकर मुकाबला किया।
फिलाडेलफिया का दूसरा सम्मेलन – 4 जुलाई 1776 को फिलाडेलफिया में ही उपनिवेशवासियों का दूसरा सम्मेलन आयोजित हुआ। इस बैठक में ‘स्वतंत्रता की घोषणा (Declaration of Independence) के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इस घोषणा को तैयार करने में वर्जिनिया के टॉमस जेफर्सन की विशेष भूमिका थी। घोषणापत्र में तेरहों उपनिवेशों ने संयुक्त रूप से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। इंगलैंड से युद्ध की आशंका को देखते हुए युद्ध के संचालन के लिए जॉर्ज वाशिंगटन को उपनिवेशों का सेनापति नियुक्त किया गया।
अमेरिकनों ने जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। अँगरेजी सरकार ने उपनिवेशवासियों के विद्रोह को कुचलने के लिए सेना भेजी। उपनिवेशवासियों की सहायता के लिए फ्रांस, स्पेन और हॉलैंड ने धन, युद्ध एवं खाद्य सामग्री भेजी । फ्रांसीसी सैनिकों ने उपनिवेशवासियों की ओर से युद्ध में भाग भी लिया। इससे अमेरिकनों में उत्साह जगा और उनका मनोबल बढ़ा। उपनिवेशवासियों को आरंभ से ही युद्ध में विजय मिलती गई। जॉर्ज वाशिंगटन ने कुशलतापूर्वक युद्ध का संचालन किया। अंततः, 1781 में ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड कॉर्नवालिस ने पराजित होकर आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही अमेरिकी स्वातंत्र्य संग्राम समाप्त हुआ।
पेरिस की संधि –1783 में पेरिस की संधि के अनुसार, अमेरिका के 13 उपनिवेशों की स्वतंत्रता को अँगरेजी सरकार ने मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार, स्वतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का उदय हुआ। इसके साथ ही पेरिस की संधि द्वारा अमेरिका और कनाडा की सीमारेखा मिसीसीपी नदी निर्धारित की गई। स्पेन और फ्रांस को कुछ उपनिवेश प्राप्त हुए।
युद्ध में अमेरिका की विजय और इंगलैंड की पराजय के कारण
अमेरिकी स्वातंत्र्य संग्राम में अमेरिका की विजय और इंगलैंड की पराजय के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
(i) इंगलैंड का अकेले युद्ध लड़ना – इंगलैंड की पराजय का प्रमुख कारण यह था कि इंगलैंड यह युद्ध अकेले लड़ा। उसे अन्य देशों का सहयोग नहीं मिला। इसके विपरीत, इंगलैंड के शत्रु और विरोधी उपनिवेशों की सहायता कर रहे थे। फ्रांस, स्पेन, हॉलैंड इत्यादि ने धन, जन और सेना से उपनिवेशों की सहायता की। प्रशा और रूस ने तटस्थता की नीति अपना ली। इससे उपनिवेशों की शक्ति बढ़ गई।
(ii) युद्धक्षेत्र का दूर होना – इंगलैंड को हजारों मील दूर अमेरिकी उपनिवेशों में युद्ध करना पड़ रहा था। इससे उसे युद्ध के सामान और रसद पहुँचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अमेरिकी उपनिवेशों को यह लाभ था कि वे अपने ही क्षेत्र में युद्ध कर रहे थे। इसलिए, वे उन असुविधाओं से बच गए जिनका सामना इंगलैंड को करना पड़ा।
(iii) इंगलैंड में योग्य राजनीतिज्ञों का अभाव – अमेरिकी स्वातंत्र्य संग्राम के समय इंगलैंड में वैसे राजनीतिज्ञों की कमी थी जो उपनिवेशवासियों की मनोभावनाओं को समझकर उसके अनुरूप नीति अपना सकें। युद्ध को सही ढंग से संचालित करनेवाले व्यक्ति का भी अभाव था। सम्राट जॉर्ज तृतीय एवं प्रधानमंत्री लॉर्ड नॉर्थ ने समस्या को गंभीरता से नहीं लिया। प्रधानमंत्री बड़ा पिट (Pitt the Elder) योग्य होते हुए भी अपनी अस्वस्थता के कारण कुछ नहीं कर सका। दूसरी ओर, जॉर्ज वाशिंगटन एक योग्य सेनानायक के अतिरिक्त दक्ष राजनीतिज्ञ एवं संगठनकर्ता भी थे।
(iv) ब्रिटिश शासन की दुर्बलता – अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के समय ब्रिटिश शासन सशक्त नहीं था। प्रशासन में आपसी मतभेद थे। ह्निग (Whig) दलवाले युद्ध का विरोध कर रहे थे। इसलिए, सरकार की शक्ति कमजोर पड़ गई थी।
(v) दुर्बल ब्रिटिश नौसेना – सप्तवर्षीय युद्ध के बाद इंगलैंड ने अपनी नौसेना के गठन पर पूरा ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत, फ्रांस की शक्तिशाली नौसेना ने उपनिवेशवासियों की सहायता कर इंगलैंड की पराजय का द्वार खोल दिया।
(vi) उपनिवेशों की शक्ति का गलत मूल्यांकन – इंगलैंड ने अपनी ताकत के घमंड में अमेरिकी उपनिवेशों की शक्ति का गलत मूल्यांकन किया। वह समझता था कि कमजोर उपनिवेशों को वह आसानी से परास्त कर देगा। इसलिए, जितना अधिक ध्यान युद्ध की नीतियों एवं इसके संचालन पर देना चाहिए था, इंगलैंड नहीं दे सका। फलतः, युद्ध में उसकी हार हुई।
(vii) उपनिवेशवासियों का निश्चित आदर्श – अमेरिकी उपनिवेशों की सफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि वे एक निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे शोषण के विरुद्ध स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए लड़ रहे थे तथा इसके लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने को कटिबद्ध थे। दूसरी ओर, इंगलैंड उपनिवेशों पर अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए रक्षात्मक युद्ध लड़ रहा था। इसलिए, इंगलैंड की पराजय निश्चितप्राय थी।
(viii) उपनिवेशवासियों की एकता –स्वतंत्रता संग्राम में अमेरिका की विजय का प्रभावी कारण यह था कि उपनिवेशवासियों ने राष्ट्रीयता की भावना से उत्प्रेरित होकर एकीकृत रूप से में युद्ध भाग लिया। साथ ही, उन्हें जॉर्ज वाशिंगटन का कुशल नेतृत्व भी मिला। इससे उन्हें युद्ध में सफलता मिली।
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक विभाजक रेखा मानी जाती है। इसके दूरगामी और निर्णायक परिणाम हुए। अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव न सिर्फ 13 उपनिवेशों पर पड़ा, बल्कि इसने विश्व के अन्य राष्ट्रों को भी गहरे रूप से प्रभावित किया। इस संग्राम के निम्नलिखित परिणाम हुए-
अमेरिका पर प्रभाव
(i) संयुक्त राज्य अमेरिका का उदय – इस युद्ध के परिणामस्वरूप अमेरिका के 13 उपनिवेशों ने आपस में मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) की स्थापना की। अब विश्व मानचित्र पर एक नए राष्ट्र का उदय हुआ। नए राष्ट्र के लिए 1787 में नया लिखित संविधान बना। इसे 1789 में किया गया। अमेरिका को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया। और नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा की व्यवस्था की गई। संविधान में मांटेस्क्यू के ‘शक्ति-पृथक्करण सिद्धांत’ को अपनाया गया। महिलाओं को संपत्ति-संबंधी अधिकार मिले, परंतु मताधिकार नहीं । मताधिकार संपत्ति के आधार पर दिया गया।
(ii) प्रथम जनतंत्र की स्थापना – संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का पहला राष्ट्र बना जिसने प्रचलित राजतंत्रात्मक-व्यवस्था के स्थान पर जनतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानायक जॉर्ज वाशिंगटन अमेरिकी गणराज्य के प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति बने ।
(iii) औद्योगिक क्रांति का आरंभ – युद्ध के दौरान अस्त्र-शस्त्रों और अन्य सामानों के निर्माण के लिए अनेक कल-कारखाने खोले गए। इससे औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। औद्योगिकीकरण ने अमेरिका की आर्थिक संपन्नता बढ़ा दी।
(iv) समाज पर प्रभाव – स्वतंत्रता संग्राम ने अमेरिकी समाज पर भी प्रभाव डाला। नई परिस्थिति में इंगलैंड के राजभक्तों को अमेरिका छोड़कर पड़ोसी राष्ट्र कनाडा जाने को विवश होना पड़ा। अतः, गणतंत्रात्मक विचारधारा से प्रभावित लोग ही अमेरिका में रह गए। औद्योगिकीकरण के कारण समाज में पूँजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। युद्ध में प्रमुखता से भाग लेने के कारण स्त्रियों का समाज में सम्मान बढ़ा तथा उनके नागरिक एवं आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की गई।
इंगलैंड पर प्रभाव
(i) औपनिवेशिक नीति में परिवर्तन-युद्ध में पराजित होने के पश्चात इंगलैंड को अपनी औपनिवेशिक नीति में परिवर्तन करने को बाध्य होना पड़ा। उसे अपने तेरह महत्त्वपूर्ण उपनिवेश खोने पड़े। अतः, उसने अब उपनिवेशों के प्रति मित्रवत नीति बनाने का प्रयास किया।
(ii) जॉर्ज तृतीय के व्यक्तिगत शासन की समाप्ति- अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने सम्राट जॉर्ज तृतीय के व्यक्तिगत शासन का अंत कर दिया। युद्ध में पराजित होने से उसकी प्रतिष्ठा घट गई और उसका पतन हो गया।
(iii) कैबिनेट प्रणाली का विकास-जॉर्ज तृतीय एक स्वेच्छाचारी शासक के समान शासन करता था, परंतु उसके पतन के बाद सत्ता हाउस ऑफ कॉमन्स के द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री के हाथों में चली गई। लॉर्ड नॉर्थ को बर्खास्त कर छोटा पिट (Pitt the Younger) को प्रधानमंत्री बनाया गया। उसने उदार नीति अपनाई। छोटा पिट ने कैबिनेट -प्रणाली (मंत्रिमंडलीय व्यवस्था) के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया।
(iv) वैदेशिक व्यापार एवं अर्थव्यवस्था को क्षति – स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व इंगलैंड का विदेशी व्यापार बड़े स्तर पर होता था, परंतु युद्ध के बाद इस स्थिति में परिवर्तन आ गया। अब व्यापारिक प्रतिबंधों के स्थान पर मुक्त व्यापार (लैसेज फेयर) की नीति को बढ़ावा दिया गया। इस नीति का प्रतिपादन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने किया था। अमेरिका से व्यापार बंद हो जाने से इंगलैंड को काफी आर्थिक क्षति हुई। इसी प्रकार, युद्ध में होनेवाले खर्च का भी इंगलैंड की अर्थव्यवस्था पर घातक प्रभाव पड़ा।
(v) इंगलैंड में सुधार—युद्ध के बाद इंगलैंड में अनेक सुधार लागू किए गए। 1782 में आयरलैंड की संसद को स्वतंत्र स्थान प्रदान किया गया। 1793 में कैथोलिक आयरिशों को मताधिकार दिया गया। 1800 में आयरिश संसद को ब्रिटिश संसद से संबद्ध कर दिया गया। अब इंगलैंड में राजनीतिक स्वतंत्रता का महत्त्व बढ़ गया। राजतंत्र सीमित और नियंत्रित हो गया। संसद का प्रभाव बढ़ गया।
फ्रांस पर प्रभाव
फ्रांस पर अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का व्यापक प्रभाव पड़ा। इस युद्ध में फ्रांस ने अमेरिका को आर्थिक और सैनिक सहायता दी थी। लफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सैनिकों ने इस युद्ध में भाग लिया था। अनेक फ्रांसीसी स्वयंसेवकों ने भी इस संघर्ष में भाग लिया था। युद्ध के बाद जब वे सैनिक और स्वयंसेवक स्वदेश लौटे तो उन्हें इस बात की अनुभूति हुई कि स्वतंत्रता तथा समानता के जिन सिद्धांतों के लिए वे संघर्ष कर रहे थे, अपने देश में उन्हीं का अभाव था। अतः, वे भी राजतंत्रविरोधी हो गए। इसके साथ-साथ अमेरिका की सहायता करने से फ्रांस की अर्थव्यवस्था बिगड़ गई। सरकार दिवालियापन के कगार पर पहुँच गई। इन घटनाओं ने 1789 की फ्रांस की क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत पर प्रभाव
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में इंगलैंड फ्रांस की भूमिका को नहीं भुला सका। वह फ्रांसीसियों को पराजित करने का अवसर खोजता रहा। भारत में उसे यह अवसर मिला। यहाँ राजनीति और व्यापार पर अधिकार करने के लिए आंग्ल- फ्रांसीसी संघर्ष हुए। इसमें अँगरेज विजयी हुए। भारतीय राजनीति और व्यापार पर उनका अधिकार हो गया।
अन्य देशों पर प्रभाव
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ा। अमेरिका से सबक लेकर इंगलैंड ने कनाडा के प्रति उदार नीति अपनाई। कनाडावासियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई। कनाडा में फ्रांस के प्रचलित कानूनों को भी मान्यता मिली। आगे चलकर इसी आधार पर कनाडा को औपनिवेशिक स्वराज्य भी मिला। इंगलैंड ने ऑस्ट्रेलिया के विकास पर भी ध्यान दिया। अमेरिका से प्रेरणा लेकर आयरलैंड ने भी इंगलैंड के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर दिया। फलस्वरूप, आयरलैंड में आगे चलकर आयरिश फ्री स्टेट नामक स्वतंत्र राज्य का उदय हुआ ।
अमेरिका पर औद्योगिकीकरण का प्रभाव
अमेरिका पर औद्योगिकीकरण का प्रभाव स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व और बाद में भी पड़ा। स्वतंत्रता युद्ध के पूर्व 13 अमेरिकी उपनिवेशों का इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति में महत्त्वपूर्ण योगदान था। उपनिवेशों से भारी मात्रा में कच्चा माल इंगलैंड को निर्यात किया जाता था। इससे इंगलैंड के कल-कारखाने एवं उद्योग-धंधे चलते थे। अमेरिकी युद्ध ने इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के लिए संकट उत्पन्न कर दिया। अमेरिका से कच्चा माल का निर्यात बंद हो गया। दूसरी ओर युद्ध के दौरान अस्त्र-शस्त्रों और अन्य आवश्यक सामानों के निर्माण के लिए अमेरिका में ही कल-कारखाने खोले जाने लगे। इससे अमेरिका में आरंभ में औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। औद्योगिकीकरण की गति धीमी रही, परंतु 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में इसमें तेजी आई। अपने आर्थिक संसाधनों का उपयोग कर अमेरिका तेजी से औद्योगिकीकरण के मार्ग पर अग्रसर हुआ। औद्योगिकीकरण के साथ कृषि का भी विकास हुआ। फलतः, अमेरिका की आर्थिक स्थिति में विस्मयकारी बदलाव आया। सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के आधार पर एक सशक्त और विकसित राष्ट्र के रूप में अमेरिका का विकास हुआ।
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का महत्त्व
अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। पहली बार 13 उपनिवेशों ने संयुक्त होकर औपनिवेशिक शासन का विरोध किया। इस विरोध ने युद्ध का स्वरूप ले लिया। युद्ध में अमेरिकी उपनिवेश विजयी हुए। परिणामस्वरूप, विश्व मानचित्र पर एक नए राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरिका का उदय हुआ । अमेरिका ने तत्कालीन प्रचलित जनतंत्रात्मक राजतंत्रात्मक व्यवस्था बहिष्कार कर शासन-प्रणाली अपनाई। इस प्रकार, अमेरिका दुनिया का पहला राष्ट्र बना जहाँ गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई गई । अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया। धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर अनेक राष्ट्रों में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण 1789 की फ्रांस की क्रांति थी।
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