15वीं-16वीं शताब्दियों में यूरोप में नए देशों और व्यापारिक मार्गों की खोज की होड़-सी लग गई। इसके लिए अनेक नाविक अभियान किए गए। इन अभियानों को अपने-अपने देश के शासकों का समर्थन एवं संरक्षण भी प्राप्त था। इनके परिणाम उत्साहवर्द्धक सिद्ध हुए। इन यात्राओं के परिणामस्वरूप न सिर्फ नई दुनिया (New World) का पता लगा, बल्कि पूर्वी व्यापार के नए और बेहतर मार्ग ढूँढ़े गए। इनसे व्यापार-वाणिज्य का विकास तो हुआ ही, साथ-साथ एक वृहत्तर विश्व की अवधारणा तथा उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का भी विकास हुआ, जिसने बाद के विश्व इतिहास को गहरे रूप से प्रभावित किया। भौगोलिक खोजों ने यूरोप में आधुनिक युग के आगमन की पृष्ठभूमि भी तैयार कर दी।
अंधकार युग की अवधारणा
पवित्र रोमन साम्राज्य – पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात यूरोप में अराजक स्थिति व्याप्त गई। प्राचीन सभ्यता-संस्कृति पतन के कगार पर पहुँच गई। बर्बर आक्रमणों के परिणामस्वरूप राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था नष्टप्राय हो गई। फ्रांक जाति के वीर विजेता और शासक शार्लमाँ (Charlemagne—742–814 ई०) ने इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर 9वीं शताब्दी में एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य के अंतर्गत फ्रांस, जर्मनी, रोम और इटली के बड़े भाग सम्मिलित थे। शार्लमाँ का यह साम्राज्य कैरोलिंगियन साम्राज्य (Carolingian Empire) के नाम से विख्यात है। शार्लमाँ ने उस समय के ईसाई जगत के धर्मगुरु पोप की अधिसत्ता स्वीकार कर ली। इससे प्रसन्न होकर पोप लियो तृतीय (Leo III) ने क्रिसमस दिवस 800 ई० को शार्लमाँ को सम्राट के रूप में मान्यता देकर उसे राजमुकुट प्रदान किया। इस घटना के पश्चात कैरोलिंगियन साम्राज्य पवित्र रोमन साम्राज्य (Holy Roman Empire) के रूप में विख्यात हुआ।
814 ई॰ में शार्लमाँ की मृत्यु के पश्चात उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। बर्बर आक्रमणकारियों ने यूरोपीय राज्य-व्यवस्था नष्ट कर दी। यूरोप में पुनः राजनीतिक अराजकता फैल गई। बर्बर जातियों के आक्रमणों से केंद्रीय व्यवस्था नष्ट हो गई। लोगों का जीवन संकटमय बन गया। शांति-व्यवस्था और जान-माल की सुरक्षा अहम आवश्यकता बन गई। ऐसी परिस्थिति में एक नई व्यवस्था का उदय हुआ, जिसे सामंतवाद (Feudalism) कहा जाता है ।
सामंतवाद– सामंतवाद कृषि और भूमि पर आधृत मध्ययुगीन व्यवस्था थी। इस व्यवस्था में समस्त भूमि का मालिक राजा होता था। उसके नीचे पदानुक्रम से अनेक सामंत होते थे, जैसे— ड्यूक या अर्ल, वैरन, नाइट इत्यादि। सामंत सुरक्षित मेनर (गढ़ी) में रहते थे। सबसे निचले पायदान पर कृषक और कम्मी थे। कम्मी अर्द्धदास के समान थे। इन सबके अधिकार और कर्तव्य निर्दिष्ट थे। कृषि के अतिरिक्त राजनीतिक व्यवस्था में भी यही पद्धति अपनाई गई। यूरोप में यह व्यवस्था पुनर्जागरण के पूर्व तक चलती रही। पुनर्जागरण के पूर्व के काल को यूरोप में मध्ययुग कहा जाता है। मध्य युग में सामंती व्यवस्था में वर्ग-विभेद बढ़ा, शोषण की प्रक्रिया बढ़ी, आर्थिक अवनति हुई, व्यापार-वाणिज्य का ह्रास हुआ तथा राजशक्ति (केंद्रीय शक्ति) कमजोर पड़ गई। यद्यपि सामंतवाद ने तत्कालीन अराजकता की स्थिति में सुरक्षा प्रदान की एवं कला और साहित्य के विकास को प्रश्रय दिया तथापि कुल मिलाकर इसने प्रगतिशील विचारों को कुंद कर दिया तथा ‘अंधकार युग’ को जन्म दिया।
रोमन कैथोलिक चर्च – यूरोपीय राजनीति और धर्म को ईसाई धर्म और रोमन कैथोलिक चर्च ने लंबे समय तक प्रभावित किया। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व रोम के सम्राट ऑगस्टस सीजर के शासनकाल में जुडिया के बेथलहेम नामक नगर में जीसस क्राइस्ट ने एक नए धर्म का उपदेश दिया। कालांतर में यह धर्म ईसाई धर्म के नाम से विख्यात हुआ। अपने उदार और सर्वग्राह्य उपदेशों के कारण यह धर्म शीघ्र ही व्यापक बन गया। समस्त यूरोप इसके प्रभाव में आ गया। रोमन सम्राट कॉन्सटैनटाइन ने 324 ई० में ईसाई धर्म को रोम का राजधर्म घोषित किया। इस समय से ईसाई धर्म का तेजी से विस्तार हुआ। धर्म के प्रसार के साथ ही इसकी संगठनात्मक व्यवस्था भी मजबूत हुई। रोम में रोमन कैथोलिक चर्च का केंद्र स्थापित हुआ और वहाँ का पोप समस्त ईसाई जगत का धर्मगुरु बन गया। धीरे-धीरे पोप की सत्ता बढ़ती गई और उसकी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ हो गई। यूरोपीय राजनीति पर भी उसका प्रभाव बढ़ गया। यद्यपि ईसाई धर्म ने सामाजिक-धार्मिक सुधार कार्यक्रम चलाए तथा शिक्षा को प्रोत्साहन दिया तथापि कालांतर में चर्च शोषण और विलासिता का केंद्र बन गया । पादरियों और पोप का नैतिक पतन हो गया । सच्चाई और सादगी के स्थान पर रोमन चर्च कट्टरपंथियों, दकियानूसी विचारवाले व्यक्तियों और रूढ़िवादियों का केंद्र बन गया। तर्क और नई विचारधारा को पनपने से रोककर, सामंतवाद के ही समान, रोमन कैथोलिक चर्च ने भी मध्ययुगीन यूरोप को अंधकार के गर्त में ढकेल दिया।
इस ‘अंधकार युग’ में व्यापार-वाणिज्य की प्रगति अवरुद्ध हो गई। यद्यपि एशिया और यूरोप में व्यापार होता था तथापि विश्व का एक बड़ा भाग- अमेरिका, अफ्रीका इत्यादि अज्ञात था। भौगोलिक जानकारी की कमी के कारण व्यापार सीमित था। समुद्री यात्रा खतरनाक और कष्टप्रद थी। कंपास का आविष्कार नहीं हुआ था। अतः, समुद्र में भटक जाने का भय बना रहता था। पृथ्वी को चपटी माना जाता था। यात्रियों को यह भय सताता था कि समुद्र में अधिक दूर जाने पर वे पृथ्वी के किनारों से गिरकर अनंत में विलीन हो जाएँगे। राज्य समुद्री यात्रियों की सहायता भी नहीं करता था। इस कठिन परिस्थिति में नाविकों और व्यापारियों के लिए अटलांटिक अथवा ‘अंधमहासागर’ की यात्रा करना अत्यंत कठिन था। अतः इस समय व्यापार- वाणिज्य और आर्थिक विकास की गति थम सी गई। ‘आधुनिक ‘युग’ के आगमन के साथ ही परिस्थितियाँ बदल गईं।
आधुनिक युग का प्रादुर्भाव
15वीं-16वीं शताब्दियों से यूरोप में मध्ययुग का अंत एवं आधुनिक युग का प्रादुर्भाव हुआ। आधुनिक युग को लाने में अनेक तत्त्वों का योगदान था, जैसे—सामंतवाद का पतन, राष्ट्रीय राज्यों का उदय, शक्तिशाली व्यापारी वर्ग एवं मध्यम वर्ग का उदय, नए नगरों एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना एवं विकास। परंतु, आधुनिक युग के प्रादुर्भाव में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण योगदान था पुनर्जागरण एवं धर्मसुधार आंदोलन का।
पुनर्जागरण- पुनर्जागरण अथवा रिनेसाँ (Renaissance) का ऐतिहासिक संदर्भ में शाब्दिक अर्थ ‘बौद्धिक जागरण’ होता है। यह उन समस्त बौद्धिक परिवर्तनों को इंगित करता है जो मध्ययुग के अंत और आधुनिक युग के आरंभ में हुए। इसका आरंभ 15वीं शताब्दी में कुस्तुनतुनिया (Constantinople) के पतन (1453) से माना जाता है। कुस्तुनतुनिया विजेंटाइन साम्राज्य (Byzantine Empire) अथवा पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी थी। यह यूनानी – रोमन ज्ञान-विज्ञान, दर्शन एवं कला का केंद्र था। 1453 में इसपर उस्मानी तुर्कों ने अधिकार कर लिया। फलतः, यहाँ के विद्वान और कलाकार यूरोप के अन्य देशों में चले गए। अधिकांश लोगों को इटली में शरण मिली। इसलिए, इटली पुनर्जागरण का केंद्र बन गया। कुस्तुनतुनिया के पतन के अतिरिक्त अन्य अनेक कारणों का भी पुनर्जागरण में योगदान था । जेरूसलम (आधुनिक इजरायल स्थित), जिसे ईसाई अपनी पवित्र भूमि (Holy Land) मानते थे, पर तुर्कों ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। इसे मुक्त कराने के लिए ईसाइयों एवं तुर्कों में धर्मयुद्ध (Crusades) हुए। इन युद्धों के कारण यूरोपवालों का संपर्क पूर्व के देशों के साथ हुआ। वहाँ के ज्ञान-विज्ञान से परिचित होकर यूरोपवासियों की कूपमंडूकता में परिवर्तन आया और नई मानसिकता विकसित हुई। इसी प्रकार, मंगोल सम्राट कुबलई खान के दरबार में विभिन्न देशों के विद्वानों, व्यापारियों और कलाकारों के आपसी मेल-जोल और संपर्क से भी पुनर्जागरण को बल. मिला। इसी समय पांडित्यपंथ (Scholasticism) के स्थान पर तर्कवाद का विकास हुआ। इसमें रोजर बेकन की प्रमुख भूमिका थी। वैज्ञानिक खोजों ने भी अंधविश्वास को मिटाने एवं तार्किक भावना के विकास को प्रश्रय दिया। कागज और छापाखाना (मुद्रणकला) के आविष्कार ने भी पुनर्जागरण के प्रसार में सहायता पहुँचाई।
सामंतवाद का पतन और व्यापार का विकास भी पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण था। व्यापार के विकास से नगरों का उदय हुआ। नगरों में बड़े व्यापारी शिक्षा एवं कला को प्रोत्साहन देने लगे। इससे विचार-स्वातंत्र्य बढ़ा और ज्ञान की प्रगति हुई। विचारों का आदान-प्रदान भी नगरों में बढ़ा।
पुनर्जागरण से आधुनिक युग का आगमन माना जाता है। इटली से आरंभ होकर शीघ्र ही यह अन्य यूरोपीय देशों- जर्मनी, इंगलैंड, फ्रांस में फैल गया। इस समय कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई।
पुनर्जागरण आधुनिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसके व्यापक प्रभाव पड़े। इसने मानव के दृष्टिकोण में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। रूढ़िवाद का स्थान तर्कवाद ने तथा अध्यात्मवाद का स्थान भौतिकवाद ने ले लिया। मध्यम वर्ग का उदय एवं मानवतावाद का विकास हुआ। उद्योग-व्यापार की प्रगति हुई। राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ जिसके परिणामस्वरूप भौगोलिक खोजों को प्रश्रय मिला। उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का विकास हुआ। पुनर्जागरण ने यूरोप को “अंधकार युग” से बाहर निकालकर “आधुनिक युग” में पहुँचा दिया।
धर्मसुधार- इसी प्रकार, धर्मसुधार (Reformation) का भी व्यापक प्रभाव पड़ा। इसने कट्टरपंथ को समाप्त कर तर्कवाद और स्वतंत्र चिंतन की भावना का विकास किया। शिक्षा और धर्म पर चर्च का प्रभाव कमजोर पड़ गया। पोप का प्रभाव कमजोर पड़ने से राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई तथा राष्ट्रीय राज्यों का उत्कर्ष हुआ एवं राष्ट्रीयता की भावना बढ़ी। चर्च द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के समाप्त होने से वाणिज्य-व्यवसाय की वृद्धि हुई। फलतः, भौगोलिक खोजों का मार्ग प्रशस्त हो गया।
भौगोलिक खोजें- यूरोपवासी सदैव पूरब के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करना चाहते थे। यूनानी सम्राट सिकंदर ने भौगोलिक खोजों को प्रश्रय दिया था जिससे पूर्वी एवं पश्चिमी जगत का व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संपर्क बढ़ा। नए जलमार्गों की खोज से भारत और रोमन साम्राज्य के बीच व्यापार का विकास हुआ। बाद में अपने प्रसार के दौरान अरब विजेताओं और भूगोलवेत्ताओं ने नए व्यापारिक मार्गों की खोज की। धर्मयुद्धों एवं पुनर्जागरण ने भी इस प्रक्रिया को गति दी। कुस्तुनतुनिया के पतन के पश्चात इस दिशा में और अधिक प्रगति हुई।
15वीं शताब्दी के अंतिम चरण से भौगोलिक खोजों का आरंभ हुआ। अनेक आधुनिक विद्वान इन सामुद्रिक अभियानों को ‘खोज यात्रा’ नहीं मानते हैं। उनका विचार है कि इसके पहले भी ‘पुरानी दुनिया’ के लोगों ने अनेक अनजान इलाकों की यात्रा एवं उनकी खोज की थी। उदाहरण के लिए, अरबी, चीनी और भारतीय यात्रियों तथा पोलिनेशियन और माइक्रोनेशियन नाविकों ने महासागरों की यात्राएँ की थीं। ग्यारहवीं शताब्दी में ही नार्वे के जलदस्युयों (Vikings) ने उत्तरी अमेरिका तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की थी। 1415 में पुर्तगालियों ने अफ्रीका के तट पर स्थित सिउटा (Ceuta) पर अधिकार कर लिया जिससे उन्हें अफ्रीका के विषय में जानकारी मिली। 1434 में पुर्तगालियों ने बोजाडोर अंतरीप (Cape Bojador), जो अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित था, में अपना व्यापारिक केंद्र स्थापित किया। अगले वर्षों में अफ्रीका में अनेक पुर्तगाली अभियान हुए जहाँ से पुर्तगाल को पर्याप्त सोना और अफ्रीकी गुलाम मिलने लगे। इससे पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था समुन्नत हुई तथा सामुद्रिक अभियानों में पुर्तगाल की दिलचस्पी बढ़ी। 1460 तक पुर्तगाली अफ्रीका के सबसे पश्चिमी छोर केप वरडे (Cape Verde) तक पहुँच चुके थे। 15वीं शताब्दी में इन भौगोलिक खोजों में अधिक गति आई। इनका प्रभाव पहले की खोजों से अधिक व्यापक और प्रभावशाली हुआ तथा इन सामुद्रिक अभियानों के परिणामस्वरूप अनेक नए देशों, जैसे – वेस्ट इंडीज, ब्राजील, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, न्यूफाउंडलैंड का पता लगा तथा भारत पहुँचने का सामुद्रिक व्यापारिक मार्ग खोजा जा सका।
भौगोलिक खोजों के कारण- भौगोलिक खोजों के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
(i) कौतूहल की भावना – यूरोप के कुछ साहसी व्यक्तियों ने कौतूहल की भावना से नए देशों की खोज का कार्य आरंभ किया। वे अपने देश से बाहर जाकर नए स्थानों का पता लगाना चाहते थे।
(ii) मॉनसून की जानकारी-मॉनसून का ज्ञान प्राप्त होने से जलयात्रा सुगम हो गई। नाविक इसका सहारा लेकर निर्विघ्न यात्रा कर सकते थे।
(iii) नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों का योगदान- भौगोलिक खोजों को बढ़ावा देने में नवीन आविष्कारों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार कर यात्रा सुलभ कर दी। 1380 में अरबों से कुतुबनुमा का ज्ञान प्राप्त कर यूरोपवालों ने इसका लाभ उठाया। कुतुबनुमा (कंपास) एवं दूरबीन के आविष्कार से खोजियों को पर्याप्त सहायता मिली। इसकी सहायता से दिशा एवं दूरी का पता लगाकर सुगमतापूर्वक यात्रा की जा सकती थी। मार्ग में भटकने की संभावना कम हो गई। मानचित्र में ऐस्ट्रोलेब (अक्षांश बतानेवाला उपकरण) अथवा उन्नतांशमापी यंत्र के व्यवहार से सुधार आया।
(iv) जहाजरानी में विकास – जहाजरानी में भी विकास हुआ। इटली, स्पेन एवं पुर्तगाल में परंपरागत नावों के स्थान पर खाँचा पद्धति से विशाल और मजबूत जहाज बनाए जाने लगे। इनमें सामान ढोने की क्षमता अधिक थी तथा आत्मरक्षा के लिए ये अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रहते थे। पुर्तगालियों ने हल्के और तेज गति से चलनेवाले कैरेवल जहाज बनाए। नए मानचित्रों तथा मार्गदर्शक पुस्तकों के फलस्वरूप समुद्री यात्रा सुगम हो गई। और भौगोलिक खोजों को गति मिली।
(v) आग्नेयास्त्रों का ज्ञान जहाजरानी में विकास के साथ- साथ सुरक्षा के दृष्टिकोण से जहाजों में आग्नेयास्त्रों को रखने की परंपरा भी विकसित हुई। जहाजों को बंदूकों एवं तोपों से सुसज्जित किया जाने लगा जिससे कि जहाजी अपनी यात्राओं के दौरान समुद्री डाकुओं का मुकाबला कर सकें। इससे समुद्री यात्रा सुरक्षित हो गई। 14वीं शताब्दी में सबसे पहले वेनिसवालों ने जहाजों को तोपों-बंदूकों से सुसज्जित करना भी आरंभ किया। 15वीं शताब्दी तक सभी यूरोपीय शक्तियाँ इनका व्यवहार करने लगीं। 16वीं शताब्दी तक यूरोपीय जहाज समुद्र में यात्रा करने योग्य सबसे अच्छे जहाज बन गए। इससे समुद्र पर यूरोपियनों का प्रभाव स्थापित हुआ और भौगोलिक खोजों को प्रेरणा मिली।
| भौगोलिक खोजों के कारण (i) कौतूहल की भावना (ii) मॉनसून की जानकारी (iii) नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों का योगदान (iv) जहाजरानी में विकास (v) आग्नेयास्त्रों का ज्ञान (vi) भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि (vii) स्पेनवासियों का उत्साह (viii) व्यापार-वाणिज्य का विकास (ix) धर्मयुद्धों का प्रभाव (x) राष्ट्रीय राज्यों का उत्कर्ष (xi) कुस्तुनतुनिया का पतन |
(vi) भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि – 15वीं शताब्दी तक अनेक पुस्तकों द्वारा लोगों का भौगोलिक ज्ञान विस्तृत हो चुका था। टॉलेमी की पुस्तक ज्योग्राफी (Geography) का खोजी नाविकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। 1477 में प्रकाशित इस पुस्तक के द्वारा नाविकों को विभिन्न क्षेत्रों के अक्षांश एवं देशांतर को समझने और उनके भूगोल को जानने में मदद मिली। टॉलेमी ने बतलाया कि दुनिया गोल है, यह तीन महाद्वीपों – यूरोप, एशिया और अफ्रीका में विभक्त है, महासागर कम चौड़े हैं जिन्हें आसानी से पार किया जा सकता है। इस जानकारी से भौगोलिक खोजों को प्रेरणा मिली। इसके पहले ही 1410 में कार्डिनल पिएर डिऐली (Cardinal Pierre d’Ailly) ने यूनानी, लैटिन और अरबी स्रोतों के आधार पर इमगो मुंडी (Imago Mundi) नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक से प्राप्त ज्ञान के आधार पर कोलम्बस को सामुद्रिक अभियान पर जाने की प्रेरणा मिली। 13वीं शताब्दी में ही इतालवी समुद्र विशेषज्ञों ने समुद्रयात्रा के दौरान व्यवहार में लाए जानेवाले नक्शे (portolano) बनाए। इनसे सामुद्रिक अभियानों में सहायता मिली।
(vii) स्पेनवासियों का उत्साह-आर्थिक और धार्मिक कारणों से उत्प्रेरित होकर पुर्तगाल के समान स्पेन ने भी भौगोलिक खोजों में उत्साह से भाग लिया। 1492 में ईसाई राजाओं द्वारा अरबों के आधिपत्य से आइबेरियन प्रायद्वीप को स्वतंत्र कराए जाने की घटना – रीकांक्विस्टा (Reconquista ) —– से उत्साहित होकर स्पेनी नए क्षेत्रों की खोज, वहाँ ईसाई धर्म के प्रचार की संभावना तथा उपनिवेश स्थापित कर राजसत्ता के विस्तार के उद्देश्य से भौगोलिक खोजों की दिशा में अग्रसर हो गए।
(viii) व्यापार-वाणिज्य का विकास – सामंतवाद के पतन, धर्मसुधार आंदोलन और पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप व्यापार- वाणिज्य की प्रगति हुई। कच्चा माल प्राप्त करने एवं निर्मित वस्तुओं की बिक्री के लिए नए देशों और व्यापारिक मार्गों की खोज आवश्यक हो गई।
(ix) धर्मयुद्धों का प्रभाव – 11वीं-12वीं शताब्दियों में आधुनिक इजरायल स्थित जेरूसलम – पवित्र नगर (Holy City ) – के आधिपत्य के प्रश्न पर ईसाइयों और तुर्कों के बीच लंबा संघर्ष हुआ। इससे सामंतवाद को तो क्षति हुई, परंतु धर्मयुद्धों के बाद यूरोपवालों की रुचि पूर्वी देशों में बढ़ गई। वहाँ से व्यापार करना अत्यंत लाभदायक था। अतः, प्रत्येक राष्ट्र इस दिशा में प्रयासशील हो गया। इससे भौगोलिक खोजों को प्रेरणा मिली।
(x) राष्ट्रीय राज्यों का उत्कर्ष – राष्ट्रीय राज्यों के उत्कर्ष के बाद प्रत्येक राष्ट्र अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने एवं अपना सम्मान बढ़ाने में लग गया। भौगोलिक खोजों से दोनों उद्देश्यों की पूर्ति संभव थी, इसलिए राष्ट्रीय राज्यों ने भौगोलिक खोजों को प्रश्रय दिया। इसमें स्पेन और पुर्तगाल की प्रमुख भूमिका थी।
(xi) कुस्तुनतुनिया का पतन – भौगोलिक खोजों को सबसे अधिक प्रेरणा 1453 में बिजेंटाइन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुनतुनिया के पतन से मिली। कुस्तुनतुनिया पर उस्मानी तुर्कों का अधिकार हो जाने से पूरब के साथ व्यापार करने के लिए यूरोपवालों को नए व्यापारिक समुद्री मार्गों की आवश्यकता पड़ी। इसका प्रमुख कारण था तुर्कों द्वारा इस मार्ग से व्यापार करनेवाले व्यापारियों से भारी कर वसूलना। अतः, इस दिशा में प्रयास आरंभ कर दिए गए।
औपनिवेशिक खोज और विस्तार
1488 में बार्थोलोमियो डियाज ने अफ्रीका के दक्षिणतम बिंदु उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) का पता लगाया। इससे भारत पहुँचने का मार्ग सरल हो गया। भौगोलिक खोजों की दिशा में कोलम्बस और वास्कोडिगामा के नाम अग्रणी हैं। इटली का क्रिस्टोफर कोलम्बस (1451-1506) स्पेन के राजा फर्डिनेंड द्वितीय और रानी इसाबेला की सहायता प्राप्त कर अगस्त 1492 में अपनी सामुद्रिक यात्रा पर निकला। उसके साथ 3 जहाज और नाविकों की एक टुकड़ी थी। उसका उद्देश्य पूरब की ओर बढ़ते हुए भारत और चीन पहुँचना था, परंतु मार्ग भटकने के कारण वह पश्चिम दिशा में बढ़ता हुआ 12 अक्टूबर 1492 को एक अन्य स्थान पर पहुँचा। इसे भारत समझकर उसने इस स्थान का नाम इंडीज रखा। यहाँ के निवासियों को उसने रेड इंडियन कहा। यह स्थान अमेरिका के निकट गुआनाहानि द्वीप था। कोलम्बस ने इसे बहामा नाम दिया। कालांतर में यह स्थान सैन सैल्वाडोर और वेस्ट इंडीज के नाम विख्यात हुआ। स्पेन के इतिहास में कोलम्बस की खोज को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। इस दिवस को (12 अक्टूबर 1492) स्पेन का राष्ट्रीय अवकाश दिवस घोषित किया गया। कोलम्बस ने 1502 तक अन्य नाविक अभियान भी किए और नए स्थानों की खोज की। कोलम्बस की मृत्यु के पश्चात फ्लोरेंस के नाविक और भूगोलवेत्ता अमेरिगो वेस्पुस्सी ने अमेरिका की यात्रा की तथा अपनी पुस्तक कॉस्मोग्राफिए इंट्रोडक्टियो (Cosmographia Introductio) में इसका विवरण दिया। उसी के नाम पर नई दुनिया का नामकरण अमेरिका हुआ। कोलम्बस के नाम पर दक्षिण अमेरिका के पश्चिमोत्तर भाग का एक छोटा क्षेत्र कोलंबिया कहलाया। अमेरिका या ‘नई दुनिया’ की खोज इटली की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। अमेरिकी महाद्वीप को ‘नई दुनिया’ इसलिए कहा गया, क्योंकि कोलम्बस की यात्रा के पहले यूरोपवालों को इसका ज्ञान नहीं था। इससे यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री यात्रा को बढ़ावा मिला।
स्पेन के समान पुर्तगाल ने भी समुद्री यात्रा एवं भौगोलिक खोजों में गहरी दिलचस्पी ली। वहाँ का राजकुमार ‘हैनरी -द- नेवीगेटर’ नाविकों को समुद्री यात्रा के लिए प्रोत्साहित करता था। उसने नाविकों के लिए एक स्कूल खोला। कोलम्बस ने भी इस स्कूल में अध्ययन किया था। उसके नाविकों ने अफ्रीका के पश्चिमी किनारे के कुछ क्षेत्रों का पता लगाया। वहाँ से पुर्तगालियों को सोना और गुलाम मिले। इस प्रकार, दास व्यापार आरंभ हुआ।
पूरब दिशा में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण खोज वास्कोडिगामा (1460–1524) ने की थी। वह एक पुर्तगाली था। उत्तमाशा अंतरीप और हिंद महासागर होते हुए 20 मई 1498 को वह भारत के मालाबार (केरल) तट पर स्थित कालीकट बंदरगाह पर पहुँचा। दक्षिणी अफ्रीका में एक भारतीय व्यापारी अब्दुल मजीद ने उसे भारत पहुँचने का मार्ग सुझाया था। कालीकट के राजा जमोरीन ने उसका स्वागत करते हुए उसे व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान कीं। वास्कोडिगामा की खोज से भारत और यूरोप का व्यापारिक संबंध बढ़ा। 15वीं एवं 16वीं शताब्दियों में अन्य स्थानों की भी खोज की गई। केबरल नामक एक पुर्तगाली जहाजी ने ब्राजील का पता लगाया। 1519-21 में मैग्लेन ने जहाज से पूरे विश्व की यात्रा की। कैप्टन कुक ने ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड के द्वीपों की खोज की। सर जॉन और सेबास्टियन कैबोट ने न्यूफाउंडलैंड द्वीपों का पता लगाया। इन भौगोलिक खोजों से समस्त विश्व की जानकारी यूरोप को हो गई। इसका लाभ उठाकर यूरोप ने व्यापार-वाणिज्य एवं उपनिवेशवाद का विकास किया।
भौगोलिक खोजों के परिणाम
15वीं एवं 16वीं शताब्दियों की भौगोलिक खोजों ने एक नए विश्व की रूपरेखा तैयार कर दी। अब पश्चिम और पूरब का सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संपर्क बढ़ा। इससे व्यापार वाणिज्य का विकास हुआ। पूर्वी देशों में यूरोपीय बाजार एवं बस्तियाँ बसने लगीं। पूर्वी व्यापार यूरोपियनों के लिए अत्यंत लाभदायक था। अतः, यूरोपीय राष्ट्रों में पूरब से व्यापार करने की होड़ लग गई। भौगोलिक खोजों के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण परिणाम हुए-
(i) व्यापार वाणिज्य का विकास-भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप व्यापार-वाणिज्य में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई। नए देशों की जानकारी के पहले यूरोपीय व्यापार मुख्य रूप से भूमध्यसागर और बाल्टिक सागर-क्षेत्र से ही होता था। अब इसका क्षेत्र विस्तृत हो गया। व्यापार-वाणिज्य अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर क्षेत्र से भी होने लगा। स्थानीय और सीमित व्यापार वैश्विक रूप में परिवर्तित होने लगा।
(ii) मुद्रा व्यवस्था का विकास-व्यापार वाणिज्य के विकास ने मुद्रा व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया। मुद्रा व्यवस्था के प्रचलन से व्यापार में सुविधा हुई। प्रत्येक देश अपनी मानक मुद्रा जारी करने लगा। धातु मुद्रा के अतिरिक्त हुंडी, ऋणपत्र इत्यादि भी रूप में प्रचलन में आए।
(iii) व्यापारिक नगरों का उत्कर्ष-व्यापार वाणिज्य के विकास के कारण अनेक व्यापारिक नगरों का उदय हुआ। इन नगरों में व्यापारी एकत्रित होकर सामानों की खरीद-बिक्री करते थे। अब भूमध्यसागरीय व्यापारिक नगरों जेनेवा और वेनिस का महत्त्व घट गया। उनका स्थान पेरिस, लंदन, लिस्बन, लिवरपूल, ब्रिस्टल, एम्सटरडम, एंटवर्प इत्यादि ने ले लिया। ये नगर और बंदरगाह व्यापारिक गतिविधियों से जीवंत हो गए।
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भौगोलिक खोजों के परिणाम (i) व्यापार-वाणिज्य का विकास (ii) मुद्रा व्यवस्था का विकास (iii) व्यापारिक नगरों का उत्कर्ष |
(iv) नई व्यापारिक शक्तियों का उदय- भौगोलिक खोजों और व्यापार वाणिज्य के विकास ने यूरोपीय व्यापार पर इटली का एकाधिकार समाप्त कर दिया। इटली के स्थान पर अब स्पेन, पुर्तगाल, इंगलैंड और फ्रांस ने यूरोपीय व्यापार पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। इनके द्वारा स्थापित उपनिवेशों से इनके व्यापार वाणिज्य का विकास हुआ।
(v) बैंकिंग व्यवस्था का विकास-व्यापार के विकास ने बैकिंग व्यवस्था को भी बढ़ावा दिया। व्यापारी अपना धन इन बैंकों में सुरक्षित रखने लगे। आवश्यकतानुसार वे इनसे ऋण लेकर अपने व्यापार का विकास भी करने लगे। 15वीं एवं 16वीं शताब्दियों में फ्लोरेंस के मेडिसी परिवार की बैंकिंग अथवा महाजनी में प्रमुख भूमिका थी। जेनेवा और अन्य नगरों में भी बैंकों की स्थापना की गई।
(vi) बहुमूल्य धातुओं का आयात-नए देशों की खोज के पूर्व यूरोप में कीमती धातुओं सोना चाँदी की कमी थी, परंतु नए देशों की खोज ने इस कमी को पूरा कर दिया। ‘नई दुनिया’ से आनेवाले सोना-चाँदी ने यूरोपीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की। सोलहवीं शताब्दी में मेक्सिको और पेरू से इतनी अधिक चाँदी आई कि लगभग 80 वर्षों तक यूरोपीय अर्थव्यवस्था चाँदी पर निर्भर रही। इससे मुद्रास्फीति हुई और कीमतों में वृद्धि हुई।
(vii) वाणिज्यवाद का विकास-बदलती परिस्थितियों में वाणिज्यवाद का भी विकास हुआ। विश्वव्यापी व्यापार के विकास ने पूँजीवाद को जन्म दिया। इसमें महाजन घरानों की प्रमुख भूमिका थी। पूँजीवाद ने कीमती धातुओं के संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ा दी। अमेरिका, एशिया और अफ्रीका से सोना-चाँदी की लूट आरंभ हो गई। इन्हें सुरक्षित रखा जाने लगा। स्पेन इस दिशा में अग्रणी था।
(viii) उपनिवेशवाद का विकास-भौगोलिक खोजों का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम हुआ उपनिवेशवाद का जन्म और विकास। व्यापारिक कंपनियों के माध्यम से संगठित व्यापार का विकास कर यूरोपीय राष्ट्रों में उपनिवेश स्थापित करने की होड़ लग गई। इंगलैंड, हॉलैंड, फ्रांस, पुर्तगाल और स्पेन ऐसे राष्ट्रों में प्रमुख थे। एशिया, अमेरिका, अफ्रीका, हिंदचीन और अन्य स्थानों में इनके उपनिवेश स्थापित हुए। उदाहरण के लिए, भारत में 1498 में पुर्तगाली, 1600 में अँगरेज, 1602 में डच और 1664 में फ्रांसीसी आए। इनलोगों ने अपनी व्यापारिक कोठियाँ (कंपनियाँ) स्थापित कर यूरोपीय व्यापार का विकास किया। इन उपनिवेशों के आर्थिक संसाधनों का दोहन कर उनकी अर्थव्यवस्था पर अधिकार कर धन कमाया गया। बाद में उपनिवेशों की शासन व्यवस्था पर भी अधिकार कर लिया गया। अतः, उपनिवेशवाद ने साम्राज्यवाद को भी जन्म दिया। इससे भी यूरोपीय राष्ट्रों में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी।
(ix) ईसाई धर्म एवं पश्चिमी सभ्यता का प्रसार-उपनिवेशों के माध्यम से यूरोपीय राष्ट्रों ने ईसाई धर्म एवं पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति का प्रसार किया। उपनिवेशों में ईसाई धर्म का प्रचार किया गया। इससे ईसाई धर्म के प्रचार में गति आई। एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिका में ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ा। धर्मप्रचार के साथ-साथ धन देकर एवं धर्मांतरण करवा कर भी ईसाई धर्म का प्रचार किया गया। इसकी प्रतिक्रिया भी उपनिवेशों में हुई। यूरोपवालों ने उपनिवेशों की परंपरागत सभ्यता-संस्कृति पर अतिक्रमण कर यूरोपीय सभ्यता-संस्कृति को थोपने का भी प्रयास किया। साथ ही, ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार से रोमन चर्च की प्रभुसत्ता कमजोर हुई तथा धर्मसुधार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
(x) दास-व्यापार-भौगोलिक खोजों और व्यापार-वाणिज्य के विकास ने मानव श्रम का महत्त्व बढ़ा दिया। इसकी आपूर्ति के लिए नए खोजे गए देशों जैसे अमेरिका, अफ्रीका के मूल निवासियों को गुलाम बनाकर यूरोपीय बाजारों में बेचा गया। लिस्बन दास व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र था। उपनिवेशवाद के विकास के साथ दास व्यापार बढ़ता गया। इन दासों पर अमानुषिक अत्याचार किए जाते थे। इनसे कठिन परिश्रम करवाया जाता था। औपनिवेशिक शक्तियों ने इन दासों का शोषण कर अपनी अर्थव्यवस्था विकसित की।
(xi) व्यापारिक माल के स्वरूप में परिवर्तन- पहले व्यापार में मुख्यतः स्थानीय वस्तुओं की खरीद-बिक्री की जाती थी, परंतु अब विभिन्न देशों की बहुमूल्य वस्तुओं एवं खाद्य पदार्थों का भी व्यापार किया जाने लगा। भारत के कपड़े और मसाले, अफ्रीका का मोती, अमेरिका के नारियल का व्यापार होने लगा। कहवा, चाय, गन्ना, मक्का, आलू, तंबाकू, नील जैसे सामान यूरोप के बाजारों में पहुँचे। इसी प्रकार, भारत और अन्य पूर्वी देशों में यूरोप से चाय, कॉफी, तंबाकू और आलू का आयात हुआ। भारतीय फल आम और गन्ना अन्य देशों में पहुँचे।
(xii) भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि – भौगोलिक खोजों ने भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि की। नए देशों एवं समुद्री मार्ग का पता लगा। इससे विस्तृत दुनिया की जानकारी मिली।
(xiii) प्रचलित भ्रांतियों का अंत-मध्यकालीन अंधकार युग में चर्च के प्रभाव से समुद्री यात्रा को लेकर अनेक भ्रांतियाँ थीं। नई खोजों ने इन भ्रांतियों को मिटा दिया। इससे रोमन चर्च का प्रभाव कमजोर हुआ। धर्मसुधार आंदोलन द्वारा चर्च के दकियानूसी विचारों पर नियंत्रण लग गया।
(xiv) अन्य महत्त्वपूर्ण परिणाम- भौगोलिक खोजों के अन्य महत्त्वपूर्ण परिणाम भी हुए। जहाजरानी का विकास हुआ। नक्शा, कंपास, दूरबीन जैसे यंत्रों का आविष्कार हुआ और उपयोग बढ़ा। इससे समुद्री यात्रा सरल हो गई। इन आविष्कारों के परिणामस्वरूप वैज्ञानिकों एवं विद्वानों का एक नया सामाजिक वर्ग सामने आया। पुनर्जागरण में इस वर्ग की प्रमुख भूमिका थी। भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप सामाजिक स्तर पर व्यापारियों, कारीगरों और मध्यम वर्ग का भी महत्त्व बढ़ा।
भौगोलिक खोजों का महत्त्व
भौगोलिक खोजें विश्व इतिहास की युगांतकारी घटना हैं। इनसे आधुनिक युग का आगमन हुआ । भौगोलिक खोजों और समुद्री यात्राओं में यूरोपीय देश अग्रणी थे। अतः, विश्व पर वे अपना वर्चस्व स्थापित कर सके। प्राचीन और मध्यकाल में यूरोप और एशिया में व्यापारिक संबंध थे, परंतु विश्व के अनेक भाग जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा एशिया के अनेक भाग अज्ञात थे। यूरोपीय यात्रियों के विवरणों से यूरोपवालों को भारत, चीन और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के विषय में जानकारी मिली। पुर्तगाली यात्री मार्कोपोलो ने विजयनगर साम्राज्य और चीन के कुबलई खान ने पूरब के वैभव से यूरोपवासियों को परिचित कराया था, परंतु भौगोलिक खोजों के बाद ही इन देशों से अधिक घनिष्ठ संबंध बने ।
इस प्रकार, भौगोलिक खोजों ने अंधकार युग का अंत कर आधुनिक युग के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। पूरब और पश्चिम का सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संबंध बढ़ा। वैश्विक अर्थव्यवस्था की शुरुआत हुई। साथ ही, पूँजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का भी विकास हुआ। यूरोप का प्रभाव शेष विश्व पर बढ़ गया।
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स्मरणीय • अंधकार युग की अवधारणा-मध्यकाल में यूरोप अंधकार युग में था। |