भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा
नालंदा हमारे इतिहास में अत्यंत आकर्षक नाम है, जिसके चारों ओर न केवल भारतीय ज्ञान-साधना के सुरभित पुष्प खिले हैं, अपितु किसी समय एशिया महाद्वीप के विस्तृत भूभाग के विद्या – संबंधी सूत्र भी उसके साथ जुड़े हुए थे । ज्ञान के क्षेत्र में देश और जातियों के भेद लुप्त हो जाते हैं । नालंदा इसका उज्ज्वल दृष्टांत था । नालंदा की वाणी एशिया महाद्वीप में पर्वत और समुद्रों के उस पार तक फैल गई थी । लगभग छह सौ वर्षों तक नालंदा एशिया का चैतन्य-केंद्र बना रहा ।
‘मगध की प्राचीन राजधानी वैभार पाँच पर्वतों के मध्य में बसी हुई गिरिब्रज या राजगृह नामक स्थान में थी । वर्तमान नालंदा उसी राजगृह के तप्त कुंडों से सात मील उत्तर की ओर है नालंदा का प्राचीन इतिहास भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के समय तक जाता है । कहते हैं, बुद्ध के समय नालंदा गाँव में प्रावारिकों का आम्रवन था । जैन ग्रंथों के अनुसार नालंदा में महावीर और आचार्य मेखलिपुत्त गोसाल की भेंट हुई थी । उस समय यह राजगृह का उपग्राम या वाहिरिक स्थान समझा जाता था, जहाँ महावीर ने चौदह वर्षावास व्यतीत किए। सूत्रकृतांग के अनुसार नालंदा के एक धनी नागरिक लेप ने धन-धान्य, शैया, आसन, रथ, सुवर्ण आदि के द्वारा भगवान बुद्ध का स्वागत किया और उनका शिष्य बन गया था ।
तिब्बत के विद्वान इतिहास-लेखक लामा तारानाथ के अनुसार नालंदा सारिपुत्त की जन्मभूमि थी । उनका चैत्य अशोक के समय में भी वहाँ था । राजा अशोक ने एक मंदिर बनवाकर उसे परिवर्द्धित किया । इस प्रकार यद्यपि नालंदा की प्राचीनता की अनुश्रुति बुद्ध, अशोक दोनों से संबंधित है; किंतु एक प्राणवंत विद्यापीठ के रूप में उसके जीवन का आरंभ लगभग गुप्तकाल हुआ । तारानाथ ने तो भिक्षु नागार्जुन और आर्यदेव इन दोनों का संबंध नालंदा से लगाया हैं और यहाँ तक लिखा है कि आचार्य दिङ्नाग ने नालंदा में आकर अनेक प्रतिपक्षियों के साथ शास्त्रों का विचार किया था, जिनमें सुदुर्जय नाम के एक ब्राह्मण विद्वान अग्रणी थे ।
चौथी सदी में चीनी यात्री फाह्यान नालंदा में आए थे । उन्होंने सारिपुत्त के जन्म और परिनिर्वाण स्थान पर निर्मित स्तूप के दर्शन किये । किंतु नालंदा का विशेष अभ्युदय इसके कुछ समय बाद हुआ ।
सातवीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के समय जब युवानचांग इस देश में आए तो नालंदा अपनी उन्नति के शिखर पर था । युवानचांग ने एक जातक की कहानी का हवाला देते हुए लिखा है कि नालंदा का यह नाम इसीलिए पड़ा था कि यहाँ अपने पूर्व-जन्म में उत्पन्न भगवान बुद्ध को तृप्ति नहीं होती थी (न-अल-दा) । सच तो यह है कि ज्ञान के क्षेत्र में जो दान दिया जाता है वह सीमारहित और अनंत होता है, न उसके बाँटने वालों को तृप्ति होती है और न उसे लेने वालों को ।
नालंदा विश्वविद्यालय का जन्म जनता के उदार दान से हुआ। कहा जाता है कि इसका आरंभ पाँच सौ व्यापारियों के दान से हुआ था, जिन्होंने अपने धन से भूमि खरीद कर बुद्ध को दान में दी थी । युवानचांग के समय में नालंदा विश्वविद्यालय का रूप धारण कर चुका था। यहाँ उस समय छह बड़े विहार थे। आठवीं सदी के यशोवर्मन के शिलालेख में नालंदा का बड़ा भव्य वर्णन किया गया है । यहाँ के विहारों की पंक्तियों के ऊँचे-ऊँचे शिखर आकाश में मेघों को छूते थे । उनके चारों ओर नीले जल से भरे हुए सरोवर थे, जिनमें सुनहरे और लाल कमल तैरते थे। बीच-बीच में सघन आम्रकुंजों की छाया थी । यहाँ के भवनों के शिल्प और स्थापत्य को देखकर आश्चर्य होता था । उनमें अनेक प्रकार के अलंकरण और सुंदर मूर्तियाँ थीं । यों तो भारतवर्ष में अनेक संघाराम हैं, किंतु नालंदा उन सबमें अद्वितीय है । चीनी यात्री इत्सिंग के समय इस विहार में तीन सौ बड़े कमरे और आठ मंडप थे । पुरातत्त्व विभाग की खुदाई में नालंदा विश्वविद्यालय के जो अवशेष यहाँ प्राप्त हुए हैं, उनसे इन वर्णनों की सच्चाई प्रकट होती है ।
आर्थिक दृष्टि से नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य और विद्यार्थी निश्चिंत बना दिए गए थे । भूमि और भवनों के दान के अतिरिक्त नित्य प्रति के व्यय के लिए सौ गाँवों की आय अक्षय निधि के रूप में समर्पित की गई थी । इत्सिंग के समय में यह संख्या बढ़कर दो सौ गाँवों तक पहुँच गई थी । उत्तरप्रदेश, बिहार और बंगाल इन तीनों राज्यों ने नालंदा के निर्माण और अर्थव्यवस्था में पर्याप्त भाग लिया । बंगाल के महाराज धर्मपालदेव और देवपालदेव के समय के ताम्रपत्र और मूर्तियाँ नालंदा की खुदाई में प्राप्त हुई हैं ।
विदेशों के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का जो संबंध था, उसका स्मारक एक ताम्रपत्र नालंदा की खुदाई में मिला है । इससे ज्ञात होता है कि सुवर्ण दीप (सुमात्रा) के शासक शैलेंद्र सम्राट श्री बालपुत्रदेव ने मगध के सम्राट् देवपालदेव के पास अपना दूत भेजकर यह प्रार्थना की कि उनकी ओर से पाँच गाँवों का दान नालंदा विश्वविद्यालय को दिया जाए। ताम्रपत्र के अनुसार नालंदा के गुणों से आकृष्ट होकर यवद्वीप के सम्राट बालपुत्र ने भगवान बुद्ध के प्रति भक्ति प्रदर्शित करते हुए नालंदा में एक बड़े विहार का निर्माण कराया। उन पाँच नव गाँवों की आय प्रज्ञा पारमिता आदि का पूजन, चातुर्दिश अर्थात् अंतरराष्ट्रीय आर्य भिक्षुसंघ के चीवर, भोजन, चिकित्सा, शयनासन आदि का व्यय, धार्मिक ग्रंथों की प्रतिलिपि एवं विहार की टूट-फूट की मरम्मत आदि के लिए खर्च की जाती थी । यह तो संयोग से बचा हुआ एक उदाहरण है, जो विदेशों में फैली हुई नालंदा की अमिट छाप हमारे सामने रखता है; लेकिन नालंदा महाविहारीय आर्य भिक्षुसंघ की धाक समस्त एशिया भूखंड में थी । इस संघ की बहुत-सी मिट्टी की मुद्राएँ नालंदा में प्राप्त हुई हैं।
नालंदा का शिक्षाक्रम बड़ी व्यावहारिक बुद्धि से तैयार किया गया था। उसे पढ़कर विद्यार्थी दैनिक जीवन में अधिकाधिक सफलता प्राप्त करते थे । मूल रूप में पाँच विषयों की शिक्षा वहाँ अनिवार्य थी । शब्द विद्या या व्याकरण, जिससे भाषा का सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो सके; हेतुविद्या या तर्क-शास्त्र, जिससे विद्यार्थी अपनी बुद्धि की कसौटी पर प्रत्येक बात को परख सकें; चिकित्सा विद्या, जिसे सीखकर छात्र स्वयं स्वस्थ रह सकें एवं दूसरों को भी नीरोग बना सकें तथा शिल्प विद्या । एक न एक शिल्प को सीखना वहाँ अनिवार्य था, जिसके द्वारा छात्रों में व्यावहारिक और आर्थिक जीवन की स्वतंत्रता आ सके । इन चारों के अतिरिक्त अपनी रुचि के अनुसार लोग धर्म और दर्शन का अध्ययन करते थे ।
आचार्य शीलभद्र योगशास्त्र के उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे । उनसे पहले धर्मपाल इस संस्था के प्रसिद्ध कुलपति थें । शीलभद्र, ज्ञानचंद्र, प्रभामित्र, स्थिरमति, गुणमति आदि अन्य आचार्य युवानचांग के समकालीन थे। जिस समय युवानचांग अपने देश चीन को लौट गए, उस समय भी अपने भारतीय मित्रों के साथ उनका वैसा ही घनिष्ठ संबंध बना रहा । जब युवानचांग नालंदा से विदा होने लगे, तब आचार्य शीलभद्र एवं अन्य भिक्षुओं ने उनसे यहाँ रह जाने के लिए अनुरोध किया । युवानचांग ने उत्तर में यह वचन कहे- “यह देश बुद्ध की जन्मभूमि है, इसके प्रति प्रेम न हो सकना असंभव है; लेकिन यहाँ आने का मेरा उद्देश्य यही था कि अपने भाइयों के हित के लिए मैं भगवान के महान धर्म की खोज करूँ। मेरा यहाँ आना बहुत ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है । अब यहाँ से वापस जाकर मेरी इच्छा है कि जो मैंने पढ़ा-सुना है, उसे दूसरों के हितार्थ बताऊँ और अनुवाद रूप में लाऊँ, जिसके फलस्वरूप अन्य मनुष्य भी आपके प्रति उसी प्रकार कृतज्ञ हो सकें जिस प्रकार मैं हुआ हूँ ।” इस उत्तर से शीलभद्र को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहा-“यह उदात्त विचार तो बोधिसत्वों जैसे है । मेरा हृदय भी तुम्हारी सदाशाओं का समर्थन करता है ।”
नालंदा के विद्वानों ने विदेशों में जाकर ज्ञान का प्रसार किया । पहले तो तिब्बत के प्रसिद्ध सम्राट स्त्रोंग छन गम्पो (630 ई०) ने अपने देश में भारती लिपि और ज्ञान का प्रचार करने के लिए अपने यहाँ के विद्वान थोन्मिसम्भोट को नालंदा भेजा, जिसने आचार्य देवविदसिंह के चरणों में बैठकर बौद्ध और ब्राह्मण साहित्य की शिक्षा प्राप्त की । इसके बाद आठवीं सदी में नालंदा के कुलपति आचार्य शान्तिरक्षित तिब्बती सम्राट के आमंत्रण पर उस देश में गए । नालंदा के तंत्र विद्या के प्रमुख आचार्य कमलशील भी तिब्बत गए थे । नालंदा के विद्वानों ने तिब्बती भाषा सीख कर बौद्ध ग्रंथों और संस्कृत साहित्य का तिब्बती में अनुवाद किया । इस प्रकार उन्होंने तिब्बत देश को एक साहित्य प्रदान किया और फिर शनैः शनै: वहाँ के निवासियों को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया । • नालंदा के आचार्य शांतिरक्षित ने ही सबसे पहले 749 ई० में तिब्बत में बौद्ध विहार की स्थापना की थी 1 इन विद्वानों में आचार्य पद्मसंभव (749 ई०) और दीपशंकर श्री ज्ञानअतिश (980 ई०) के नाम उल्लेखनीय हैं ।
साहित्य और धर्म के अतिरिक्त नालंदा कला का भी एक प्रसिद्ध केंद्र था, जिसने अपना प्रभाव नेपाल, तिब्बत, हिन्देशिया एवं मध्य एशिया की कला पर डाला । नालंदा की कांस्य मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर और प्रभावोत्पादक हैं। विद्वानों का अनुमान है कि कुर्किहार से प्राप्त हुई बौद्ध मूर्तियाँ नालंदा शैली से प्रभावित हैं । वस्तुतः नालंदा की सर्वांगीण उन्नति उस समन्वित साधना का फल था जो शिल्पविद्या और शब्दविद्या एवं धर्म और दर्शन के एक साथ पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने से संभव हुई । हमारी अभिलाषा होनी चाहिए कि भूतकाल के इस प्रबंध से शिक्षा लें और कला, शिल्प, साहित्य, धर्म, दर्शन और ज्ञान का एक बड़ा केंद्र नालंदा में हम पुनः स्थापित करें ।
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