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Course: 9th History
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9th History

2-अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-83)

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3-फ्रांस की क्रांति (1789)

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4-प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध (1914-45)

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5-नाजीवाद और हिटलर का उत्कर्ष (1934-45 )

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5-नाजीवाद और हिटलर का उत्कर्ष (1934-45 )

नाजीवाद और हिटलर का उत्कर्ष (1934-45 )

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की राजनीति की दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं— इटली में बेनिटो मुसोलिनी के नेतृत्व में फासीवाद एवं जर्मनी में एडोल्फ हिटलर नेतृत्व में नाजीवाद का उदय और विकास। इनका उदय दो विश्वयुद्धों के मध्य की अवधि में हुआ । इन दोनों घटनाओं का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ा और समस्त राजनीतिक परिदृश्य बदल गया ।

नाजीवाद का अर्थ – नाजीवाद अथवा नात्सीवाद का जनक जर्मनी का एडोल्फ हिटलर था। नाजीवाद एक आंतरिक जर्मन प्रक्रिया थी जिसने उसके अधिकारवाद तथा राष्ट्रवाद की पुरानी जर्मन राजनीतिक विचारधाराओं को पुनः जागृत कर दिया। हिटलर का नाजीवाद “सैनिकवाद, वीरपूजा, राज्य की सर्वोच्चता के सिद्धांत, ‘शक्ति ही अधिकार है’ के सिद्धांत, यहूदी – विरोध, जर्मनी के लिए अतिरिक्त प्रदेशों की माँग तथा आर्य प्रजाति की श्रेष्ठता के सिद्धांत का समन्वय था ।”

हिटलर के उदय की पृष्ठभूमि

जर्मनी की तत्कालीन स्थिति – नाजीवाद के प्रवर्तक एडोल्फ हिटलर का जन्म ऑस्ट्रिया के ब्रौना में 20 अप्रैल 1889 को हुआ था। उसके आरंभिक दिन गरीबी में व्यतीत हुए। प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ होने पर वह जर्मन सेना में भरती हो गया। युद्ध में जर्मनी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा उसे आरंभिक सफलता भी मिली। फ्रांस और बेल्जियम पर जर्मनी ने आधिपत्य जमा लिया। युद्ध में हिटलर ने असाधारण वीरता दिखलाई जिसके लिए उसे आयरन क्रॉस से सम्मानित किया गया। 1917 में संयुक्त राज्य अमेरिका के युद्ध में प्रवेश करने से मित्र राष्ट्रों (इंगलैंड, फ्रांस और रूस) की शक्ति बढ़ गई। फलतः, नवंबर 1918 में जर्मनी और उसके सहयोगी राष्ट्रों की पराजय हुई। इसके बाद जर्मनी में घटनाक्रम तेजी से बदला । युद्ध में पराजित होने पर जर्मन सम्राट कैजर विलियम द्वितीय ने गद्दी त्याग दी और वह हॉलैंड चला गया। समाजवादी प्रजातांत्रिक दल ने सत्ता अपने हाथों में लेकर फ्रेडरिक एर्बट को चांसलर नियुक्त किया । 11 नवंबर 1918 को नई सरकार ने युद्धविराम संधि पर हस्ताक्षर किया। जर्मनी में वेमर नामक स्थान पर राष्ट्रीय सभा की बैठक हुई। इस सभा ने वेमर गणतंत्र (Weimar Republic) की स्थापना की तथा वेमर संविधान 11 अगस्त 1919 को लागू किया। इसके अनुसार, जर्मनी में संघीय शासन-व्यवस्था लागू की गई तथा राष्ट्रपति को आपातकालीन शक्तियाँ दी गईं। इस गणतंत्रात्मक सरकार के समर्थक मुख्यतः समाजवादी, कैथोलिक और डेमोक्रैट्स (जनतंत्रवादी) थे। नई सरकार ने ही वर्साय (28 जून 1919) की अपमानजनक संधि की। इसकी जर्मनी में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई । सामाजिक स्तरीकरण में सैनिकों का महत्त्व बढ़ गया। राजनेता और सेना उग्र राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सम्मान की माँग करने लगे।

          जिस समय ये घटनाएँ घट रही थीं उस समय हिटलर अस्पताल में भरती था। वर्साय की संधि की खबर सुनकर उसे अत्यधिक रोष हुआ। जर्मन अपमान के लिए उसने नेताओं को दोषी ठहराया। उसने राजनीति में प्रवेश करने का निश्चय किया। जर्मनी में स्थिति असंतोषजनक थी। गणतंत्र के समर्थक और इसके नेता नवंबर क्रिमिनल्स (November Criminals) के नाम से पुकारे गए। हिटलर ने इस असंतोष को बढ़ावा देना आरंभ किया।

          अस्पताल से स्वस्थ होकर उसने युवकों के साथ संपर्क स्थापित किया। 1919 में उसने जर्मन वर्कर्स पार्टी (German Workers’ Party) की सदस्यता ग्रहण की। उसने इसका पुनर्गठन किया और इसपर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। अब उसने इसका नाम बदलकर नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (National Socialist German Workers’ Party) रखा। यही पार्टी बाद में नाजी पार्टी (Nazi Party) के नाम से विख्यात हुई। हिटलर इस दल का नेता या फ्यूहरर बन गया।

          हिटलर गणतंत्र-विरोधी था। 1923 में उसने लूडेनडार्फ के साथ मिलकर गणतंत्रात्मक सरकार का तख्ता पलटने का प्रयास किया, परंतु यह विफल हो गया। हिटलर पर मुकदमा चलाकर उसे कारावास की सजा दी गई। कारावास से हिटलर को शीघ्र ही मुक्ति मिल गई। कारावास में ही उसने अपनी आत्मकथा मेरा संघर्ष (मेन केम्फ, Mein Kampf) का प्रथम भाग लिखा। इसमें उसने जनतंत्र के विरुद्ध असंतोष प्रकट किया एवं इसकी कटु आलोचना की। जेल से रिहा होकर वह नाजी पार्टी के संगठन में जुट गया। हिटलर की नाजी पार्टी के कार्यक्रमों, उसके भाषणों, विशाल प्रदर्शनों एवं जनसभाओं से इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। पार्टी के लाल रंग का झंडा, जिसपर स्वस्तिक का चिह्न बना हुआ था, जगह-जगह लहराया जाने लगा। हजारों लोगों ने नाजी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। पार्टी की शाखाएँ पूरे जर्मनी में खुल गईं। जनता नाजी पार्टी एवं हिटलर को अपना उद्धारक और मसीहा मानने लगी। हिटलर को साधारण जनता, उद्योगपतियों, जर्मन देशभक्तों, भूतपूर्व सैनिक पदाधिकारियों सभी का समर्थन और सहयोग मिला।

          इसके बावजूद 1930 तक हिटलर को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। इतना ही नहीं, गणतंत्रवादियों के प्रयासों से 1925 में लोकार्नो समझौता के अनुसार जर्मनी को राष्ट्रसंघ की सदस्यता मिल गई। 1928 में नाजी पार्टी को जर्मन संसद राइखस्टाग (Reichstag) में सिर्फ 2.6 प्रतिशत मत ही मिले, लेकिन 1929 की आर्थिक मंदी के दौरान और बाद में नाजी पार्टी का प्रभाव बढ़ता गया। उत्साहित होकर हिटलर ने 1932 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा। इसमें उसकी पराजय हुई, परंतु वह हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने अपना प्रभाव इतना अधिक बढ़ा लिया था कि राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग ने उसे 30 जनवरी 1933 को अपना प्रधानमंत्री (चांसलर) नियुक्त किया। चांसलर बनते ही उसने अपनी सत्ता सुदृढ़ करने और गणतंत्र को समाप्त करने का प्रयास आरंभ कर दिया। संसद के लिए चुनाव इस प्रकार कराए गए कि सिर्फ नाजी दल के लोग ही जीत सके। इस संसद का नाम तृतीय राइख (Third Reich) रखा गया। फरवरी 1933 में संसद भवन में आग लगने के बाद सभी नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए। कम्युनिस्टों एवं नाजी-विरोधियों का सफाया किया गया। मार्च 1933 एक कानून इनेबलिंग ऐक्ट (Enabling Act) बनाकर हिटलर को अध्यादेश के द्वारा शासन करने का अधिकार दिया गया। इसका लाभ उठाकर हिटलर ने नाजी पार्टी के अतिरिक्त अन्य सभी राजनीतिक दलों एवं श्रमिक संगठनों पर रोक लगा दी। गेस्टापो (Gestapo) और अन्य विशिष्ट पुलिस टुकड़ियों द्वारा नाजी पार्टी के विरोधियों पर आतंक का राज्य स्थापित किया गया। भाषण, प्रकाशन और संगठन पर रोक लगा दी गई। साम्यवादियों को यातना शिविरों में भेज दिया गया। अर्थव्यवस्था, सेना, न्याय और संचार माध्यमों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया गया।

          1934 में जर्मन राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग की मृत्यु हो गई। इसके पूर्व जर्मन संसद ने एक कानून पारित किया था जिसके अनुसार राष्ट्रपति की मृत्यु के बाद नए राष्ट्रपति का चुनाव नहीं होना था, वरन राष्ट्रपति का पद चांसलर के पद के साथ मिला दिया जाना था। इस प्रावधान का सहारा लेकर हिटलर ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री (चांसलर) दोनों पदों को मिलाकर सारी सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली। इस प्रकार, जर्मनी में हिटलर के अधीन सर्वाधिकारवादी (totalitarian) राज्य की स्थापना हुई। वह देश का फ्यूहरर (नेता) बन गया। उसने एक जनता, एक साम्राज्य और एक नेता (One people, One empire and One leader) का नारा दिया। 1945 तक वह जर्मनी का भाग्यविधाता बना रहा।

हिटलर (नाजीवाद) के उत्कर्ष के कारण
जर्मनी में हिटलर और उसकी नाजी पार्टी के सत्ता में आने अथवा नाजी क्रांति के अनेक कारण थे। इनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं—

(i) 1919 की वर्साय की अपमानजनक संधि – प्रथम विश्वयुद्ध में पराजित होने पर जर्मनी को मित्र राष्ट्रों के साथ एक कठोर और अपमानजनक संधि करनी पड़ी। मित्र राष्ट्रों ने प्रथम विश्वयुद्ध के लिए जर्मनी को उत्तरदायी ठहराया और संधि की कड़ी शर्तें रखीं। इस संधि के अनुसार, जर्मनी को अपने सभी उपनिवेशों, अपने साम्राज्य के 13 प्रतिशत क्षेत्र और 10 प्रतिशत आबादी से हाथ धोना पड़ा। इसके 75 प्रतिशत लोहा एवं 26 प्रतिशत कोयला की खानों पर फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क और बेल्जियम ने अधिकार कर लिए। एक नए पोलैंड राज्य की स्थापना की गई। बाल्टिक तट से पोलैंड का सीधा संपर्क कायम करने के लिए जर्मनी के बीचोबीच एक वृहत प्रदेश पोलैंड को दिया गया। यह पोलिश गलियारा (Polish Corridor) के नाम से जाना गया। जर्मनी की नौसेना के जहाज जब्त कर लिए गए तथा सैनिकों की संख्या एक लाख तक सीमित कर दी गई। क्षतिपूर्ति के रूप में जर्मनी को भारी रकम देनी थी। उसे 6 अरब पौंड की धन राशि हरजाना के रूप में देनी पड़ी। उसकी खनिज संपदा से परिपूर्ण राइनलैंड पर मित्र राष्ट्रों ने अधिकार कर लिया।
वर्साय की इस संधि ने जर्मनों और हिटलर को उद्वेलित कर दिया। हिटलर इस संधि को राजमार्ग की डकैती (highway robbery) कहा। हिटलर ने अपने भाषणों में इस संधि की कड़ी आलोचना कर जनता को प्रजातंत्रवादियों की तरफ से अपनी ओर कर लिया।

(ii) आर्थिक मंदी – प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की आर्थिक स्थिति अत्यधिक बिगड़ गई थी। 1922 में क्षतिपूर्ति की रकम अदा नहीं करने पर फ्रांस ने जर्मनी के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र रूर (Ruhr) प्रदेश पर अधिकार कर लिया। वहाँ के खनिज और उद्योग फ्रांस के कब्जे में चले गए। देश में अनाज की भी कमी हो गई। इससे खाद्य पदार्थों का अभाव हो गया। उदाहरण के लिए, एक पावरोटी खरीदने के लिए एक गाड़ी कागजी मुद्रा देनी पड़ती थी। मुद्रास्फीति अत्यधिक बढ़ गई। सरकार को बाध्य होकर कागजी मुद्रा (जर्मन मार्क) जारी करनी पड़ी। 1925 के अंत तक करोड़ों कागजी मार्क का मूल्य एक डॉलर के बराबर हो गया। इस दयनीय स्थिति को 1929 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने और बढ़ा दिया। जर्मनी दिवालियापन की स्थिति में पहुँच गया। कृषि, उद्योग एवं व्यापार ठप पड़ गए। 1932 तक जर्मनी के औद्योगिक उत्पादन में 40 प्रतिशत की गिरावट आई। देश में भुखमरी और बेकारी बढ़ गई। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए। हिटलर ने इस दयनीय स्थिति के लिए प्रजातंत्रवादियों को दोषी ठहराया। उसने नाजी पार्टी की ओर से आकर्षक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जिससे जनता की स्थिति में सुधार लाया जा सके। जनता को लगा कि हिटलर और नाजी पार्टी उनके दुर्दिन को समाप्त कर देंगे। अतः, हिटलर को जनसमर्थन मिलने लगा।

(iii) साम्यवाद का बढ़ता प्रभाव – वेमर गणतंत्र (Weimar Republic) में सामाजिक प्रजातंत्रवादियों (Social Democrats) का प्रभुत्व था। ये मार्क्सवादी थे। ये जर्मनी में सोवियत संघ जैसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे। साम्यवादी विचारधारा जर्मनी में राष्ट्रीयता के लिए एक बड़ी चुनौती थी। जर्मनी की बड़ी जनसंख्या साम्यवाद की बढ़ती शक्ति को देश के लिए संकट मानती थी। हिटलर ने जनता को साम्यवाद के विनाशकारी प्रभावों से परिचित कराया। अपने भाषणों में उसने साम्यवादियों की कटु आलोचना की। फलतः, जर्मनीवासी साम्यवादी चंगुल से बचने के लिए बड़ी संख्या में नाजी दल में सम्मिलित होने लगे।

(iv) यहूदी – विरोधी भावना जर्मनी का एक बड़ा जनसमुदाय, जिसमें मध्यम वर्ग और बेरोजगार थे, यहूदी-विरोधी थे। उनका मानना था कि प्रथम विश्वयुद्ध में यहूदियों के विश्वासघात के कारण ही जर्मनी की पराजय हुई थी। साधारण जनता भी यहूदियों से घृणा करती थी। वह यहूदियों को सूदखोर मानकर अपनी आर्थिक दुर्दशा के लिए उन्हें उत्तरदायी मानती थी। हिटलर जनता के इस मनोभाव से पूरी तरह परिचित था। उसने स्वयं भी यहूदी-विरोधी नीति अपना ली। उसने यहूदियों के प्रति घृणा का प्रचार किया। उसने यहूदियों को न सिर्फ प्रथम विश्वयुद्ध में पराजय के लिए, बल्कि जर्मनी की दुर्दशा के लिए भी उत्तरदायी ठहराया। हिटलर के इन विचारों का सेना, उद्योगपतियों, जंकरों (भूमिपतियों) तथा गणतंत्र-विरोधी राजनीतिज्ञों पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। वे सभी हिटलर को जर्मनी का मसीहा मानकर उसके साथ हो गए।

(v) जर्मनी में अंतर्निहित सैनिक प्रवृत्ति – जर्मनी में सैनिक मनोवृत्ति आरंभ से ही प्रभावशाली थी। बिस्मार्क ने रक्त और लौह (Blood and Iron) की नीति अपनाकर जर्मनी का एकीकरण किया था। प्रथम विश्वयुद्ध तक जर्मनी सैनिक दृष्टिकोण से एक शक्तिशाली राष्ट्र बन चुका था, परंतु प्रथम विश्वयुद्ध के बाद स्थिति बदल गई। सैनिकों की संख्या सीमित कर सेना पर करारा प्रहार किया गया। इससे सैनिक प्रवृत्ति को ठेस पहुँची तथा सेना
के सामने बेकारी की समस्या उठ खड़ी हुई। हिटलर ने इस स्थिति का लाभ उठाया। उसने जर्मनों की सैनिक मनोवृत्ति को उभारा। उसने एक स्वयंसेवक दल की स्थापना की। इसमें युवा और अन्य लोग बड़ी संख्या में भर्ती होने लगे। ये हिटलर के विचारों का प्रचार भी करते थे। इससे हिटलर और नाजी दल की शक्ति बढ़ी।

(vi) जर्मनी में गणतंत्र की विफलता – प्रथम विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जर्मनी में गणतंत्रात्मक सरकार की स्थापना की गई। यह सरकार आरंभ से ही जर्मनों में अलोकप्रिय रही, क्योंकि इसने वर्साय की अपमानजनक संधि की थी। इसके अतिरिक्त जर्मनी में गणतंत्रात्मक प्रवृत्ति की जड़ें गहरी नहीं थीं। गणतंत्र की स्थापना भी पराजित होने के दबाव में करनी पड़ी। सामाजिक प्रजातंत्रवादी इस गणतंत्र को सही ढंग से चला नहीं सके। स्पार्टकिस्ट आंदोलन को दबाने के लिए उनलोगों ने प्रतिक्रियावादी तत्त्वों से समझौता किया जो गणतंत्र को किसी भी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इन तत्त्वों में सेना प्रमुख थी। वेमर संविधान में अंतर्निहित दुर्बलताएँ भी गणतंत्र की विफलता के लिए उत्तरदायी बनीं। हिटलर ने गणतंत्रात्मक व्यवस्था एवं इसके नेताओं की कटु आलोचना कर सेना एवं जनसाधारण को अपना पक्षधर बना लिया। इससे उसकी शक्ति बढ़ गई।

(vii) हिटलर को सभी वर्गों का समर्थन – हिटलर तथा नाजियों को जर्मन समाज के हर वर्ग का सहयोग और समर्थन मिला। कुलीन वर्ग के लोगों ने हिटलर का समर्थन इसलिए किया, क्योंकि वे वेमर गणतंत्र को समाप्त करना चाहते थे। नाजियों के एक नई सामाजिक व्यवस्था लाने के वादे से छात्र और युवा वर्ग प्रभावित हुआ। किसान और छोटे शहरों में रहनेवाले औद्योगिकीकरण और बड़े शहरों के विरुद्ध थे। उन्हें उम्मीद थी कि हिटलर इन प्रवृत्तियों से उनकी रक्षा करेगा। निम्न-मध्यवर्गीय लोग तथा छोटी नौकरी एवं व्यवसाय करनेवाले मुद्रास्फीति से बुरी तरह प्रभावित हुए। वे इस व्यवस्था को समाप्त होते देखना चाहते थे। निम्न-मध्यवर्गीय लोग गणतंत्र को अयोग्य और भ्रष्टाचार से पूर्ण मानते थे। नाजियों ने उन्हें सुनहले सपने दिखाए। नाजी पार्टी यह दावा करती थी कि यह दल अन्य सभी दलों से अलग है। वह यह भी कहती थी कि वह चुनावों में सिर्फ इसलिए भाग ले रही थी, क्योंकि उसे तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को समाप्त कर एक नए समाज एवं राष्ट्र का निर्माण करना है। नाजी पार्टी के इस प्रचार से सभी वर्ग हिटलर के समर्थक बन गए।

(viii) हिटलर का व्यक्तित्व – नाजी दल और हिटलर के राजनीतिक उत्कर्ष का एक महत्त्वपूर्ण कारण स्वयं हिटलर का आकर्षक और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व था। वह भाषण देने में अत्यंत निपुण था। अपने भाषणों से वह श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। उसके सत्तारूढ़ होने में जनमत का उसके पक्ष में होना अत्यंत सहायक हुआ। हिटलर जर्मन जाति की मनोभावना से पूरी तरह परिचित था। वह जानता था कि जर्मनीवासी वर्साय की संधि के अपमान को भूले नहीं हैं। इसलिए, अपने भाषणों में वह संधि का और इसे करनेवाले ‘नवंबर क्रिमिनल्स’ का उल्लेख करना कभी नहीं भूलता था। वह यहाँ तक कहता था कि ‘वर्साय के संधिपत्र को फाड़ डालो’। जनता उसके विचारों से उसकी ओर आकृष्ट हुई। वह उसे अपने राष्ट्रीय अपमान का बदला लेनेवाला एवं राष्ट्रीय गौरव की स्थापना करनेवाला समझने लगी।

नाजीवादी दर्शन
नाजी दर्शन हिटलर की विचारधाराओं पर केंद्रित था। विश्व और मानव समुदाय के प्रति उसका एक विशिष्ट दृष्टिकोण था। नाजी दर्शन की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

(i) प्रजातीय स्तरीकरण – हिटलर का मानना था कि सभी प्रजातियाँ समान नहीं थीं। उसके अनुसार, नॉर्डिक जर्मन आर्य प्रजातीय स्तरीकरण के शीर्ष पर तथा यहूदी सबसे निचले स्तर पर थे। वह यहूदियों को आर्यों का दुश्मन मानता था। अन्य सभी प्रजातियाँ इन दोनों के बीच थीं। हिटलर का यह दर्शन चार्ल्स डार्विन और हर्बर्ट स्पेन्सर के विचारों से प्रभावित था। डार्विन ने विकासवादी सिद्धांत तथा स्पेन्सर ने अतिजीविता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। हिटलर ने इसे आदर्श मानकर यह दावा किया कि सबसे शक्तिशाली प्रजाति ही बच सकती है, कमजोर प्रजातियाँ नष्ट हो जाएँगी। उसका यह भी मानना था कि आर्य प्रजाति सर्वश्रेष्ठ है। पूरे विश्व पर शासन करने के लिए इसे अपनी शुद्धता बनाए रखनी होगी तथा इसे मजबूत और शक्तिशाली बनना होगा।

(ii) भौगोलिक-राजनीतिक दृष्टिकोण – नाजीवाद का दूसरा दर्शन लेबेन्खाउम (Lebensraum), अर्थात रहने योग्य स्थान की तलाश से संबद्ध था। हिटलर का मानना था कि अपने लोगों को बसाने के लिए नए क्षेत्रों पर अधिकार करना आवश्यक है। इससे स्वराष्ट्र की सीमा का विस्तार होगा। नए क्षेत्रों में निवास
करनेवाले लोग अपनी मूलभूमि से संबंध बनाए रखेंगे। इसके साथ-साथ नए क्षेत्रों के अधिग्रहण से जर्मन राष्ट्र के भौतिक साधनों एवं शक्ति में वृद्धि होगी। इस उद्देश्य से हिटलर ने पूरब की ओर प्रसार करने की नीति अपनाई जिससे कि सभी जर्मनों को एक भौगोलिक क्षेत्र – पोलैंड में बसाया जा सके।

(iii) सर्वाधिकारवाद का प्रसार एवं गणतंत्र की आलोचना – नाजी दर्शन सर्वाधिकारवाद का समर्थक था। यह सारी शक्ति एक व्यक्ति अथवा राज्य में केंद्रित करना चाहता था। इसलिए, यह जनतंत्रात्मक व्यवस्था, उदारवाद एवं लोकतंत्र का विरोधी था । नाजी दर्शन में संसदीय संस्थाओं के लिए कोई स्थान नहीं था। नाजी सारी शक्ति एक महान और शक्तिशाली नेता के हाथों में सौंप देने की बात करते थे।

(iv) उग्र राष्ट्रवाद का समर्थक – नाजी उग्र राष्ट्रवाद में विश्वास करते थे। उनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि था। जर्मनीवासियों में अंतर्निहित भावना को उभारकर हिटलर ने उग्र राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया।

(v) समाजवाद का विरोध- नाजीवाद समाजवाद एवं साम्यवाद का कट्टर विरोधी था । इसके विपरीत इसने पूँजीवाद का समर्थन किया। इससे जर्मनी के पूँजीपति उसके साथ हो गए। इंगलैंड और फ्रांस ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इस नीति का समर्थन किया।

(vi) महान नेता का गुणगान – नाजीवाद (हिटलर) का गुणगान करना एवं उसके आदर्शों का पालन करना आवश्यक था। हिटलर की आलोचना प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से नहीं की जा सकती थी। ऐसा करनेवालों के लिए दंड सुनिश्चित था। हिटलर के अभिवादन के लिए विशिष्ट पद्धति अपनाई गई।

(vii) यहूदी-विरोधी नीति – नाजीवाद की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशिष्टता यह थी कि यह यहूदियों के प्रति असीम घृणा का भाव रखता था। यह हिटलर के प्रजातीय स्तरीकरण के सिद्धांत का प्रतिफल था। यहूदियों को अवांछित तथा ईसा मसीह का हत्यारा और सूदखोर माना गया। उनपर अनेक पाबंदियाँ लगाई गई। उन्हें घोर यातनाएँ एवं अपमान सहने पड़े। लाखों यहूदियों की हत्या करवा दी गई। यहूदियों के साथ-साथ जिप्सियों और काले लोगों को भी निम्न प्रजाति का मानकर उनपर अत्याचार किए गए। नाजियों ने एक ऐसे राज्य की कल्पना की जिसमें सिर्फ शुद्ध नस्लवाले आर्य (नोर्डिक) ही निवास कर सकें। यहाँ तक कि शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ जर्मनों को भी जर्मनी में रहने योग्य नहीं मान कर उनकी हत्या करवा दी गई। हिटलर वस्तुतः एक जातीय राज्य (racial state) की स्थापना करना चाहता था।

(viii) सैन्यवाद को प्रोत्साहन – जनतांत्रिक व्यवस्था को विफल करने तथा सैनिकों का सहयोग लेने के लिए नाजियों ने सैन्यवाद और युद्ध को बढ़ावा दिया। नाजी अपने लक्ष्य की पूर्ति बल और युद्ध का सहारा लेकर करना चाहते थे।

          इस प्रकार, नाजीवाद लोकतंत्र-विरोधी, सर्वसत्तावाद, निरंकुश शासन और सैन्यवाद का समर्थक था। इसने उग्र राष्ट्रवाद पर भी बल दिया। नाजियों ने समाजवाद और साम्यवाद का विरोध किया एवं पूँजीवादी व्यवस्था को समर्थन दिया ।

नाजीवाद का प्रभाव

नाजीवाद ने जर्मनी के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी। जर्मनी की आंतरिक एवं विदेश नीति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। पूरे विश्व पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। नाजीवाद ने विश्व के अन्य भागों में स्वतंत्रता-विरोधी भावनाओं को बलवती किया। इससे तानाशाही प्रवृत्ति को समर्थन मिला। नाजियों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए एवं उसे रोकने में अपने को असमर्थ पाकर अनेक यूरोपीय राष्ट्रों ने जर्मनी के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाई। सैन्यवाद और उग्र राष्ट्रवाद ने विश्वशांति को खतरे में डाल दिया। शांति और सामूहिक सुरक्षा के प्रयास में राष्ट्रसंघ विफल हो गया। नाजीवाद के विकास के साथ ही साम्यवाद-विरोधी धारा प्रबल हो गई। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो गई। भय और आतंक का वातावरण व्याप्त हो गया। हिटलर और नाजियों के कार्यकलापों ने द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ करवा दिया।

हिटलर के कार्य

गृह नीति

(i) अधिनायकतंत्र की स्थापना – जर्मनी में सत्ता सँभालते ही हिटलर ने सारी शक्तियाँ अपने हाथों में केंद्रित कर ली तथा तानाशाह बन बैठा। नाजी दल के अतिरिक्त अन्य सभी राजनीतिक दलों और श्रमिक संघों को भंग कर दिया गया। एक अध्यादेश के द्वारा नाजी पार्टी के अतिरिक्त अन्य दलों का संगठन अवैध घोषित कर दिया गया। नाजी-विरोधी राजनीतिज्ञों और समाजवादियों की योजनाबद्ध रूप से हत्या करवाई गई।
नाजी दर्शन से भिन्न पुस्तकें वृहत स्तर पर जलवा दी गई। स्वायत्त संस्थाओं पर केंद्रीय नियंत्रण स्थापित किया गया।

(ii) विशेष सुरक्षा दल का गठन – नाजी दर्शन के अनुकूल सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के उद्देश्य से विशेष पुलिस एवं सुरक्षा दल का गठन किया गया। इनमें गेस्टापो (Gestapo) अथवा गुप्तचर पुलिस दल सबसे महत्त्वपूर्ण था। इस गुप्तचर पुलिस का संगठन इतना प्रबल था कि साधारण-से-साधारण और गुप्त-से-गुप्त घटनाओं की सूचना हिटलर को मिल जाती थी। गेस्टापो भय और आतंक का पर्याय बन गया। गेस्टापो किसी को भी मुकदमा चलाए बिना गिरफ्तार कर यातना गृहों में भेज सकता था।

(iii) यहूदियों पर भीषण अत्याचार – अपनी प्रजातीय विभेद ‘अवांछित प्रजातियों’, की नीति के वशीभूत होकर हिटलर विशेषतः यहूदियों पर अवर्णनीय अत्याचार किए। उनके दमन के लिए अनेक दमनकारी कानून पारित किए गए। यहूदी छात्रों एवं . शिक्षकों को स्कूलों से निकाल दिया गया। यहूदियों को नौकरियों से वंचित कर दिया गया। जर्मन कचहरियों में यहूदी वकीलों के वकालत करने पर रोक लगा दी गई। यहूदी डॉक्टरों को अस्पतालों से निकाल दिया गया। यहूदियों की संपत्ति जब्त कर ली गई। उन्हें अलग बस्तियों (घेटो) में रहने को विवश किया गया। यहूदियों के सभी राजनीतिक अधिकार समाप्त कर दिए गए। न्यूरेमबर्ग कानून के अनुसार 1935 में उन्हें मताधिकार से वंचित कर उनकी जर्मन नागरिकता छीन ली गई। यहूदियों को जर्मनी छोड़कर जाने को विवश किया गया। उन्हें यातना शिविरों में पशुओं की तरह रखा गया एवं गैस चैंबरों में डालकर उनकी हत्या कर दी गई। हिटलर ने यहूदियों को समूल नष्ट करने की नीति अपनाई और मानवता के विरुद्ध अक्षम्य अपराध किया। 

(iv) शिक्षा – व्यवस्था में परिवर्तन-हिटलर का मानना था कि एक सशक्त समाज का गठन तभी संभव है जब युवाओं को उचित शिक्षा दी जाए। इसलिए, स्कूलों में दी जानेवाली शिक्षा को भी नाजी दर्शन के अनुकूल बनाया गया। पाठ्यपुस्तकों को पुनः लिखवाया गया। इनमें नाजीवाद की प्रशंसा कर इसे अपनाने को कहा गया। प्रजातिविज्ञान को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया। इतिहास की पुस्तकें नाजी दर्शन के अनुरूप लिखाई गईं। खेल-कूद पर विशेष ध्यान दिया गया। छात्रों को यहूदियों घृणा करने, हिटलर के प्रति स्वामिभक्त बने रहने एवं उसकी पूजा करने को कहा गया।

(v) युवाओं के प्रति नीति –हिटलर युवकों एवं छात्रों को मजबूत, शक्तिशाली और सैनिक गुणों से परिपूर्ण बनाना चाहता था। इसलिए, उनमें युद्धोन्माद उत्पन्न किया गया। छात्रों को कड़े अनुशासन में रखने की व्यवस्था की गई। 10 वर्ष की उम्र बच्चों को जुंगवोक (Jungvolk) नामक संस्था में भर्ती होने को कहा गया। 14 वर्ष से ऊपर के सभी युवाओं को हिटलर यूथ (Hitler Youth) नामक संस्था में भर्ती किया गया। यहाँ उन्हें युद्ध और आक्रमण से प्यार करने तथा प्रजातंत्र से घृणा करने का पाठ पढ़ाया गया। उन्हें कड़ा शारीरिक प्रशिक्षण भी दिया गया। 18 वर्ष की आयु में उन्हें श्रमिक सेवा तथा बाद में सशस्त्र सेना में नियुक्त करने की व्यवस्था की गई। सभी युवाओं के लिए इस प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक था। युवतियों के लिए दि लीग ऑफ जर्मन मेडेन्स (The League of German Maidens) की सदस्यता ग्रहण करना आवश्यक बना दिया गया जहाँ उन्हें घरेलू उत्तरदायित्वों तथा मातृत्व की शिक्षा दी गई।

(vi) नाजीवाद के प्रसार के लिए प्रचार माध्यम का सहारा- नाजीवाद के प्रसार के लिए हिटलर ने प्रचार माध्यम का कुशलतापूर्वक उपयोग किया। ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य जनमत को नाजी दल के पक्ष में करना था। इसके लिए रेडियो, अखबार, चलचित्र इत्यादि का सहारा लिया गया। यहूदियों के विरुद्ध दि इटर्नल ज्यू (The Eternal Jew) नामक फिल्म बनाई गई। हिटलर ने गोबेल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया जिसने नाजी दर्शन एवं हिटलर की महानता का प्रचार किया। गोबेल्स की नीति थी ‘अफवाह को इतना फैला दो कि वह सत्य प्रतीत होने लगे’।

(vii) धर्म के प्रति नीति – हिटलर धर्म पर भी राजकीय नियंत्रण स्थापित करना चाहता था। इसलिए, उसने जर्मनी के प्रोटेस्टेंट चर्च को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया, लेकिन वह इसमें पूरी तरह सफल नहीं हो सका। हिटलर ने रोमन कैथोलिक चर्च के प्रधान पोप से समझौता किया। इसके अनुसार, कैथोलिकों को भी वे सारी सुविधाएँ दी गईं जो प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों को प्राप्त थीं । पोप ने हिटलर को आश्वासन दिया कि कैथोलिक जर्मन राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यह व्यवस्था भी स्थायी नहीं हुई। नाजियों ने कैथोलिकों पर अत्याचार किए और कैथोलिक नाजी-विरोधी बन गए।

(viii) जनसंख्या बढ़ाने का प्रयास – यद्यपि नाजियों ने पुरुषों और स्त्रियों में विभेद किया एवं उन्हें समानता की नजर से नहीं देखा तथापि एक शक्तिशाली जर्मन राष्ट्र के उद्देश्य को ध्यान में रखकर जर्मनी की जनसंख्या बढ़ाने के लिए युवतियों को अच्छी माता बनने एवं शुद्ध नस्ल की आर्य संतानों का पालन करने को कहा गया। उनपर आर्य नस्ल की शुद्धता बनाए रखते हुए अधिक-से-अधिक बच्चे पैदा करने को कहा गया। ऐसा करनेवाली महिलाओं को अस्पतालों, दुकानों तथा थियेटरों में विशेष रियायतें दी गईं। महिलाओं को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया तथा उन्हें ऑनर क्रॉस (Honour Cross) दिया गया। यहूदियों एवं अन्य अवांछित पुरुषों से संबंध रखनेवाली महिलाओं को सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित कर दंडित किया गया। अविवाहित व्यक्तियों पर टैक्स लगाया गया। इन उपायों से जर्मनी की जनसंख्या तेजी से बढ़ी।

(ix) आर्थिक सुधार – हिटलर के समक्ष राष्ट्र की अर्थव्यवस्था सुधारने की भी समस्या थी। उसने ह्यालमार शाख्त (Hjalmar Schacht) नामक अर्थशास्त्री को अपना अर्थमंत्री बनाया। उसने अधिकतम उत्पादन और अधिक-से-अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की नीति अपनाई । हिटलर ने कृषि में सुधार लाने एवं योजनाबद्ध रूप से जर्मनी का आर्थिक विकास करने का निश्चय किया। सभी आर्थिक सुधार राजकीय नियंत्रण में किए गए। कृषि के विकास के लिए विशेष कार्यक्रम बनाया गया जिससे जर्मनी खाद्यान्न उत्पादन में शीघ्र ही आत्मनिर्भर हो गया। इससे अनाज की कमी की समस्या दूर हो गई। उद्योगों के विकास के लिए चतुर्वर्षीय योजना 1936 में लागू की गई। इसका उद्देश्य अपने देश में ही सभी वस्तुओं का निर्माण करना था जिससे विदेशी आयात समाप्त किया जा सके। इससे स्वदेशी वस्तुओं का निर्माण और उपयोग बढ़ा। सेना की आवश्यकता की वस्तुओं, अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण एवं उनके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया, क्योंकि हिटलर जानता था कि उसे शीघ्र ही एक लंबा युद्ध लड़ना है। हजारों मील लंबी सड़कें बनवाई गईं। आम जनता के लिए वॉक्सवैगन (Volkswagen) मोटरगाड़ी बनाई गई।

          व्यापार- संबंधी नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। विदेशी व्यापार पर सरकारी नियंत्रण स्थापित हुआ । आयात को नियंत्रित किया गया तथा निर्यात को बढ़ावा दिया गया। कारखानों में तालाबंदी, हड़ताल आदि प्रतिबंधित कर दिए गए। मजदूरों के कार्य करने की अवधि निश्चित कर दी गई। उन्हें अन्य सुविधाएँ भी दी गईं। उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति से बेरोजगारी कम हुई। हिटलर के इन कार्यों से जर्मनी में पुनः आर्थिक प्रगति हुई।

विदेश नीति
हिटलर जर्मनी के साथ मित्र राष्ट्रों द्वारा किए गए अपमानजनक और विद्वेषपूर्ण व्यवहार को भूला नहीं था। अपने नाजी दर्शन के अनुसार, वह शक्ति के बल पर जर्मन साम्राज्य की सीमा और गौरव को बढ़ाना चाहता था । हिटलर की विदेश नीति के मूलतत्त्व थे. – अपमानजनक वर्साय की संधि को समाप्त करना, जर्मनी को एकसूत्र में बाँधना, साम्यवाद के प्रसार को रोकना तथा जर्मन साम्राज्य का विस्तार करना । वह यूरोप में साम्यवाद के प्रसार को भी रोकना चाहता था। अतः, सत्ता में आते ही वह अपनी नीतियों के कार्यान्वयन में सक्रिय हो गया।

 

(i) राष्ट्रसंघ से संबंध-विच्छेद – जर्मनी राष्ट्रसंघ (League of Nations) का सदस्य था, परंतु यह उसके हितों की रक्षा नहीं कर सका। वर्साय की कठोर और अपमानजनक संधि से जर्मन आहत थे। राष्ट्रसंघ का सदस्य बने रहने से जर्मनी को कोई लाभ नहीं था। उसने जेनेवा निरस्त्रीकरण की शर्तों को सभी देशों पर लागू की जाने की माँग की, परंतु ऐसा नहीं हुआ। अतः, 1933 में राष्ट्रसंघ के तत्त्वावधान में हो रहे निरस्त्रीकरण सम्मेलन से हिटलर ने जर्मन प्रतिनिधियों को वापस बुला लिया। उसने राष्ट्रसंघ की सदस्यता त्याग दी।

(ii) वर्साय की संधि को अस्वीकार करना – वर्साय की संधि द्वारा जर्मनी पर क्षतिपूर्ति के रूप में जो हरजाना थोप दिया गया था उसे हिटलर ने देने से इनकार कर दिया। इसके साथ-साथ उसने जर्मनी की सैनिक शक्ति पर लगाए गए प्रतिबंध को भी नहीं माना। जर्मनी में सैनिक सेवा अनिवार्य बना दी गई। सेना की संख्या बढ़ाई गई तथा बड़ी मात्रा में अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया गया। 1935 में हिटलर ने वर्साय की संधि को मानने से इनकार कर दिया।

(iii) ऑस्ट्रिया-जर्मनी का एकीकरण – ऑस्ट्रिया में जर्मन प्रजाति की बड़ी संख्या थी। इसलिए, 1938 में उसने “एक जनता, बहुत एक साम्राज्य और एक नेता” का नारा देकर ऑस्ट्रिया को जर्मनी के साथ एकीकृत कर लिया।

(iv) राइनलैंड और चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार – हिटलर ने राइनलैंड पर 1936 में पुनः अधिकार कर लिया। चेकोस्लोवाकिया के सुडेटनलैंड में जर्मन लोग बड़ी संख्या में थे। अतः, हिटलर इसपर अधिकार करना चाहता था। 1938 के म्यूनिख सम्मेलन में सुडेटनलैंड जर्मनी को दे दिया गया, परंतु हिटलर इससे संतुष्ट नहीं हुआ। उसने संपूर्ण चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार करने की योजना बनाई। 1939 में उसने चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर लिया, क्योंकि वहाँ भी जर्मन प्रजाति के लोग बड़ी संख्या में थे।

(v) रोम-बर्लिन-टोकियो धुरी का गठन – अबीसीनियाई युद्ध में जर्मनी ने इटली की सहायता की थी। फलतः, रोम (इटली की राजधानी) और बर्लिन (जर्मनी की राजधानी) ने आपस में एक संधि कर ली। यह रोम-बर्लिन धुरी ( Rome-Berlin Axis) के नाम से विख्यात हुई। रोम और बर्लिन ने स्पेनी शासक जनरल फ्रैंको से भी मित्रता स्थापित की। 1936 में जर्मनी और जापान ने साम्यवाद के विरुद्ध एक आपसी समझौता ( कॉमिंटर्न-विरोधी समझौता किया। 1937 में इटली भी इसमें सम्मिलित हो गया।
फलतः, यह त्रिदलीय संधि रोम-वर्लिन टोकियो धुरी (Rome-Berlin-Tokyo Axis) के नाम से विख्यात हुई।

(vi) सोवियत संघ के साथ संधि – 1939 में हिटलर ने सोवियत संघ के साथ अनाक्रमण संधि की। इसके अनुसार, दोनों राष्ट्रों ने एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करने का आश्वासन दिया। यह संधि शीघ्र ही समाप्त हो गई।

(vii) इंगलैंड से समझौता –1935 में हिटलर ने इंगलैंड के साथ एक समझौता किया। इसके अनुसार, इंगलैंड इसके लिए सहमत हो गया कि जर्मनी अपनी स्थल एवं वायुसेना में वृद्धि कर सकता है। यह समझौता इस शर्त पर हुआ कि जर्मनी अपनी नौसेना में 35 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी नहीं करेगा। यह हिटलर की कूटनीतिक विजय थी।

(viii) पोलैंड पर आक्रमण – 1934 में हिटलर ने पोलैंड के साथ दस वर्षों के लिए अनाक्रमण संधि की थी, फिर भी हिटलर इससे संतुष्ट नहीं था। वर्साय की संधि द्वारा पोलैंड को जो ‘पोलिश गलियारा’ दिया गया था उसे हिटलर वापस ले लेना चाहता था । उसने पोलैंड से इसे वापस करने की माँग की। हिटलर की माँग को पोलैंड ने ठुकरा दिया। फलतः, 1 सितंबर 1939 को हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया।

          द्वितीय विश्वयुद्ध प्रथम विश्वयुद्ध से भी अधिक भयंकर एवं विनाशकारी था। इसमें धुरी राष्ट्रों की पराजय हुई। पराजित और हताश हिटलर ने अपने मंत्री गोबेल्स और अपने परिवार सदस्यों के साथ अप्रैल 1945 में बर्लिन के एक बंकर में आत्महत्या कर ली। मई 1945 में जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही हिटलर और द्वितीय विश्वयुद्ध की कहानी समाप्त हुई ।

          हिटलर की क्रूर और दमनकारी नीतियों की पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रिया हुई। जब तक विश्वयुद्ध चलता रहा नाजी अत्याचारों की खबरें छिटपुट रूप से ही बाहर आती रहीं, परंतु विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद यहूदियों और हिटलर के विरोधियों पर किए गए नाजी अत्याचारों की सूचना से पूरा विश्व स्तब्ध रह गया। इसे विध्वंस (Holocaust) की संज्ञा दी गई। नाजियों से बदले की भावना बलवती हो गई। बचे हुए यहूदियों द्वारा नाजियों के अत्याचारों की कहानी सुनकर बदले की माँग की जाने लगी। पराजित और हताश हिटलर ने तो आत्महत्या कर ली, परंतु उसकी सरकार के बचे हुए कुछ प्रमुख नाजी अधिकारियों को युद्ध अपराधी और मानवता विरोधी घोषित कर मुकदमा चलाकर दंडित किया गया।

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